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चिंगलिश यानि चीनी इंग्लिश

पिछले पोस्ट में मैंने ये दिखाया था कि कैसे हम भारतीय खुद अपनी मातृभाषा की दुर्गति कर रहे है। आइये आज देखे कि चीन में जहाँ इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा लोग अंग्रेजी लिख पढ़ना सीख रहे है वहाँ पर अंग्रेजी का क्या हाल है।



















(सभी चित्र साभार : न्यू योर्क टाइम्स)

आज ये समस्या भी सुलझ गई

वैसे तो मेरा ब्लॉग अमूमन हॉट लिस्ट में नहीं आता और पाठक संख्या भी औसत ही रहती है पर फिर भी एक बार अवधिया जी ने टिपण्णी में लिखा था की मेरे ब्लॉग को खुलने में काफी समय लगता है. उन्होंने सलाह दी थी कि मैं अपने ब्लॉग पर विडजेट संख्या कम कर दूँ. मैंने भी उनके आदेशानुसार अपने ब्लॉग पर लगाये हुए लगभग सारे विडजेट को तुरंत ही हटा लिए लेकिन अफ़सोस इससे पोस्ट खुलने की स्पीड में कोई खास परिवर्तन नहीं आया. इसके बाद मैंने भी इस विषय पर ज्यादा रिसर्च नहीं की और मामला सरकारी दफ्तरों की तरह ठन्डे बस्ते में चला गया.


आज जब मैं अपने ब्लॉग पर गया तो पाया की पोस्ट खुलने की गति में कुछ तो बाधक है. बस उसी वक़्त से में उस दोषी को ढूंढने में लग गया. थोड़ी खोज बीन के बाद पता चला की मैंने अपनी पोस्ट में एक स्क्रिप्ट लगा रखी थी जिससे ये पता चलता है की उस पोस्ट को कितनी बार पढ़ा गया. बस ये महाशय ही असली गुनाहगार थे जो पोस्ट को जल्दी लोड होने से रोक रहे थे. अब मैंने वो स्क्रिप्ट हटा दी है. आशा है जब कोई भी पाठक मेरे ब्लॉग पर किसी पोस्ट को पढने के लिए क्लिक करेगा तो पेज जल्दी लोड हो जायेगा.

आभार होगा अगर आप टिपण्णी के द्वारा ये बतलाने की कृपा करेंगे कि क्या आपको इस पोस्ट को लोड होने में ज्यादा इंतज़ार करना पड़ा.

जरुरी नहीं है की हर बार विडजेट ही आपके पेज डाउनलोड को धीरे कर रहा हो. अन्य कारण जैसे कोई जावा स्क्रिप्ट भी आपके पोस्ट को तुरंत लोड करने में गतिअवरोधक का काम कर सकती है.

क्रिकेट में प्रत्येक रन के तेरह लाख रूपये - वाह वाह आईपीएल

दीवानगी भी जो न कराये वो कम है. आईपीएल का तृतीय संस्करण ख़त्म हो चुका है. अपने प्रथम संस्करण से ही मीडिया में छाये रहने वाले इस मनोरंजन को क्रिकेट का नाम देकर और आम जनता की भावनाओ से जोड़ कर अब तक तो हर बार अच्छी तरह से भुनाया गया है.

क्या आप यकीन करेंगे अगर कोई आपसे कहे कि गरीबो के देश में आपको क्रिकेट खेलने और प्रत्येक रन बनाने के लिए तेरह लाख रूपये (जी हाँ बिल्कुल ठीक सुना आपने) तेरह लाख रूपये मिलेंगे जो की हमारी प्रति व्यक्ति वार्षिक आय ३८,०८४ रूपये से पैतीस गुना ज्यादा है . ध्यान रहे ये प्रति व्यक्ति की सालाना आय है जबकि क्रिकेट खेलने पर आपको पैसा आपको पांच हफ्ते में ही मिल रहा है. साल के बाकि बचे सेतालिस सप्ताह आप और किसी जगह क्रिकेट खेल कर या कुछ और कर के पैसा कमाने के लिए आजाद है.
जी हाँ ये हमारे आईपीएल का ही कमाल है. ये वो ही आईपीएल है जिसमे पचास से ज्यादा मैच खेले गए और हर मैच के बाद पार्टी हुई जिसमे प्रत्येक खिलाडी को शिरकत करना अनिवार्य था. अनुमान है कि हर पार्टी में करीब ढाई हज़ार बियर की बोतले और पांच सौ बोतल व्हिस्की का सेवन हुआ . मैदान से बहार जो भी खेल हुआ उसके आंकड़े तो हासिल होना मुश्किल है लेकिन मैदान पर जो खेल हुआ उस पर विश्लेषण किया जा सकता है.

जहाँ जयसूर्या को जहाँ एक रन बनाने के तेरह लाख रूपये मिले, वही माहि या धोनी को हर रन के बदले दो लाख बत्तीस हज़ार रूपये मिले। युवराज को हर रन पर एक लाख पिच्यासी हज़ार, गंभीर को एक लाख सोलह हज़ार, सहवाग को एक लाख सात हज़ार और तेंदुलकर को प्रत्येक रन के करीब अस्सी हज़ार रूपये मिले. आइये देखे कुछ मुख्य खिलाडियों का प्रत्येक रन कितने रूपये का पड़ा.
Cost vs performance analysis of batsmen in IPL 2010
Player
Cost ($)
Match
Runs
Avg
Strikerate
$/Run
Rs/Run
ST Jayasuriya
975000
4
33
8.25
106.45
29545
1311818
BB McCullum
700000
5
114
28.50
103.63
6140
272631
JP Duminy
950000
7
157
31.40
119.84
6050
268662
KP Pietersen
1350000
7
236
59.00
150.31
5720
253983
MS Dhoni
1500000
13
287
31.88
136.66
5226
232055
YuvrajSingh
1063750
14
255
21.25
128.14
4171
185217
A Symonds
1350000
16
429
30.64
125.80
3146
139720
KA Pollard
750000
14
273
22.75
185.71
2747
121978
CH Gayle
800000
9
292
32.44
158.69
2739
121643
G Gambhir
725000
11
277
30.77
127.64
2617
116209
AC Gilchrist
700000
16
289
18.06
156.21
2422
107543
V Sehwag
833750
14
356
25.42
163.30
2342
103984
SC Ganguly
1092500
14
493
37.92
117.66
2216
98391
HH Gibbs
575000
10
267
26.70
113.61
2153
95617
RV Uthappa
800000
16
374
31.16
171.55
2139
94973
KC Sangakkara
700000
13
357
29.75
138.91
1960
87058
RG Sharma
750000
16
404
28.85
133.77
1856
82425
SR Tendulkar
1121250
15
618
47.53
132.61
1814
80555
JH Kallis
900000
16
572
47.66
115.78
1573
69860
YK Pathan
475000
14
333
27.75
165.67
1426
63333
SK Raina
650000
16
520
47.87
142.85
1250
55500
ML Hayden
375000
16
346
21.62
124.01
1083
48121
DPMD Jayawardene
475000
13
439
43.90
147.31
1082
48041
DA Warner
250000
11
282
28.20
147.64
886
39361
SR Watson
125000
6
185
37.00
162.28
675
30000
M Vijay
50000
15
458
35.23
156.84
109
4847
TL Suman
30000
14
307
34.11
119.45
97
4338
SS Tiwary
40000
16
419
29.92
135.59
95
4238
NV Ojha
30000
1
377
31.41
132.28
79
3533

वाह रे मेरे नेताओ का गरीब देश। ये नेता हर साल गरीबी मिटाने के नाम पर वोते मांगते है। गरीबी तो मिटती है लेकिन राजनेता और अफसरशाहो की. तभी तो आज स्विस बैंक में भारतीयों का कुल 1456 बिलियन डालर (जी हां एक लाख पैतालीस हज़ार छ सौ करोड़ डालर) का काला पैसा जमा है जो वहां के बैंको में जमा अन्य सब देशो के कुल जमा पैसो से भी ज्यादा है. सचमुच धन्य है हमारा देश और धन धान्य से पूरा भरा ये आईपीएल !!!!

किसी भी चर्चा को बहस बनने से कैसे रोके

हम लोग प्रतिदिन अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक पेशे में अन्य लोगो से चर्चा करते है । ये सर्वविदित है की वार्तालाप में सम्मिलित हर व्यक्ति का अपना एक़ दृष्टिकोण होता है. हर व्यक्ति अपने फायदे को इस चर्चा में सबसे ऊपर रख कर चर्चा में हिस्सा लेता है. ऐसे में एक को नुकसान पहुंचा कर दुसरे को फायदा देने की प्रवर्ती हावी होती है। एक ऐसा रास्ता जिसमे दोनों पक्षों की जीत हो इसके प्रयास कम ही किये जाते है. इसीलिए अक्सर चर्चा बहस में तब्दील हो जाती है। जरुरी नहीं की ऐसी चर्चा केव व्यवसाय सम्बन्धी हो, ये चर्चा घरेलु या व्यक्तिगत भी हो सकती है जो तत्काल बहस में बदल जाती है। जिसका नतीजा सब पक्षों की हार होता है।

इन चर्चाओ को बहस बन कर सबके हारने की बजाये कैसे इसमें से सबको जीत दिलाने वाली स्थिति की तरफ बढने का प्रयास किया जाये, यही मैंने अपने इस लेख के द्वारा समझाया गया है।

प्रसिद्ध लेखक डेल कार्नेगी के अनुसार किसी भी बहस से बचने का सबसे अच्छा तरीका है की उसमे शामिल ही मत हो | लेकिन ये रबार मुमकिन नहीं हो पाता चाहते हुए भी हम बहस में उलझ जाते है जिसके परिणाम अक्सर कारात्मक ही होते है। आगे बढने से पहले ये जरुरी है की हम बुनियादी तौर पर चर्चा और बहस में अंतर को समझे. आइये चर्चा और बहस में फर्क पर एक नज़र डालते है।





































चर्चा
बहस
चर्चा में शामिल प्रत्येक व्यक्ति जीतता हैबहस में शामिल प्रत्येक व्यक्ति हारता है
सामने वाला व्यक्ति समस्या सुलझाने में हमारा भागीदार है सामने वाला व्यक्ति हमारा विरोधी है और उसको हराना है
हम विचारो का आदान प्रदान करते है, अन्य विकल्प तलाशते है और उन विकल्प के नफा नुकसान को तोलते हैहम अपनी बात पर अड़ जाते है, लकीरे खींच देते है और विपक्ष पर आक्रामक रवैया अपनाते है
हम दुसरे व्यक्ति का नजरिया समझने की कोशिश करते है और उस व्यक्ति के दृष्टिकोण को तलाशते है जिसे हमने पहले कभी नहीं सोचा सर्वप्रथम तो हम विरोधी को सुनते ही नहीं है, और अगर सुनते भी है तो उसकी बात में कमजोर और विवादित मुद्दे ढूंढ़ने के लिए
हम मुद्दे पर ज्यादा जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करते है. उस मुद्दे पर अपना और सामने वाले का नजरिया समझने की कोशिश करते है हम किसी भी नए तर्क को सुनने को तैयार ही नहीं है और अपने विचार पर अड़ जाते है
हमें लोगो का सहयोग अपेक्षित होता है, न की उनकी मूक सहमतीहम अपनी बात को श्रेष्ट और विरोधी की बात को कमजोर सिद्ध करने में लग जाते है.
हम सामने वाले पर व्यक्तिगत आरोप न लगाकर एक सभ्य सामाजिक दायरे में रह कर अपनी असहमति प्रकट करते है.अगर हम बहस को जीत भी जाते है तो भी एक मित्र या बिज़नस पार्टनर खो ही देते है



चर्चाओ को बहस बनाने से रोकने के कुछ कारगर कदम :

  • वाद विवाद से बचे : किसी भी चर्चा में दलीले पेश कर तर्क वितर्क न करे. सभ्य बने. जितनी आप अपने विचारो की कद्र करते है उतना ही सम्मान सामने वाले के विचारो को दे. बिना आक्रामक मुद्रा अपनाए, निश्चयात्मक रहे।
  • मुद्दों में दिलचस्पी रखे, न की कोई पूर्वनियोजित स्तिथि पर अड़ जाए : मसलन पहले ऐसा कुछ किया था तो ऐसा हुआ था इसलिए हर बार ऐसा ही होगा ये नहीं सोचे बल्कि ये देखे की पिछली असफलता से कैसे दूर रहा जाए.
  • स्पष्ट और सम्बंधित प्रश्न पूछे : मुद्दों से सम्बंधित प्रश्न पूछे और प्रश्न भी स्पष्ट हो जिनका उत्तर "हाँ" या "ना" में नहीं हो. जैसे क्या आपको मेरा ये प्रस्ताव स्वीकारीय है ? पूछने की बजाये ये पूछे कि "आपको मेरा प्रस्ताव कैसा लगा ?" जिससे सामने वाले को जवाब देने की आज़ादी मिले.
  • यदि आप गलत है तो स्वीकार कर ले : नयी जानकारी प्रकाश में अपनी राय को बदलने में अहं को बीच में मत आने दे. नए तथ्यों को समझ कर अपनी राय बदलना समझदारी और परिपक्वता की निशानी है.
  • यदि आप सही है तो सामने वाले को नीचा दिखने का प्रयास नहीं करे : ध्यान रखे आपका ध्येय लोगो का विश्वास जीतना है न कि उनको नीचा दिखाना. आप अगर यहाँ दरियादिली दिखायेंगे तो शर्तिया आपका फायदा कही ज्यादा होगा.
  • सुने : ध्यान पूर्वक सामने वाले व्यक्ति को सुने और बीच में टोके नहीं. वक्ता के हाव, भाव, इशारो को अपने दिल, दिमाग, कान और आँखों से सुने और देखे. केवल उन शब्दों पर मत जाए जो आपके कान में पड़ रहे है.
  • नजरिया समझे : प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ भी करता है, उसमे उसका एक नजरिया होता है। उस नजरिये को समझे. अगर आप पहले से ही उस व्यक्ति की आलोचना में लग जायेंगे तो संभव है को वो अपनी बात को और भी कड़ाई से रखे और अप्रसन्न हो अपनी बात पर अड़ जाए. इसके बजाये उसकी बात में छुपे हुए कारण को खोजे हो सकता है आपको उस नजरिये की जड़ तक पहुँच जाए.
  • सहमती बनाये : अक्सर हम लोगो से सिद्धान्तक रूप से सहमत होते है पर उनकी कार्य प्रणाली से नहीं. हमें उस कार्य को दुसरे तरीके से करना ज्यादा अच्छा लगता है. ऐसे में आम सहमती बनाये और सामने वाले व्यक्ति को एक मुसीबत या मुद्दे को हल करने वाला एक साथी समझे न की अपना कोई मित्र या शत्रु.

बस इन बातो पर गौर फरमाएं और देखे आप कैसे जीवन की रह में सफलता की तरफ बढ़ते है. और हाँ अपना कुछ समय निकल पर इस लेख पर अपने विचार अवश्य वक्त करे. यदि किसी कारण से आपके पास समय का आभाव है तो निम्नलिखित विकल्प में से एक चुन कर अपनी प्रतिक्रिया मुझ तक अवश्य पहुचने का कष्ट करे. (चित्र : साभार गूगल)

अगली कड़ी में : आधुनिक कॉरपोरेट मैनेजमेंट और श्रीमाद्भाग्वाद गीता

बातचीत का मनोविज्ञान

शब्दों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारे ऊपर भौतिक और रासायनिक प्रभाव पड़ता है. आप किसी छोटे बच्चे को तुतला कर बोलते हुए देखते है तो अनायास ही आपको उस पर प्यार आ जाता है. कोई आपकी तारीफ करता है तो आपके चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है और कोई अपशब्द बोल दे तो चेहरा लाल हो जाता है.

यद्यपि हम और आप सभी लोग हर रोज कितने ही लोगो से बात करते है लेकिन क्या आप जानते है कि बातचीत करना अपने आप में एक बहुत बड़ी कला है. नेता और अभिनेता प्रजाति के लोग अक्सर बातचीत की इस कला में काफी दक्ष होते है और ये कला कुछ हद तक उन लोगो को दुसरो से अलग सफलता के नए मुकाम तक पहुचाने में मदद करती है.

एक सिमित परिधि के रहते, अक्सर देखा गया है की छोटे शहरो के बच्चे, महानगरो के बच्चो के मुकाबले, बातचीत की इस विधा में उन्नीस रह जाते है. चूँकि बातचीत करना एक कला है इसलिए थोडा सा ध्यान देकर हर व्यक्ति न केवल अपनी बात सही ढंग से कह सकता है बल्कि सामने वाले व्यक्ति का नजरिया भी ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकता है और अपने व्यक्तित्व में निखार ला सकता है.

हम जब भी कोई वाक्य बोलते है तो हम शब्दों से तथ्य, मतलब (अर्थ), भाव और इरादे से में एक या एक से अधिक चीज़ अपने वाक्य के द्वारा दर्शाते है.

"सड़क दुर्घटना हो गई है" कहने को तो ये सीधा सा वाक्य है लेकिन अगर जिस तरह से इसे बोला जाता है उससे इसके भिन्न भिन्न मतलब निकल सकते है. उदहारण के तौर पर :

कुछ गाड़ियाँ सड़क पर आपस में टकरा गई है (तथ्य)
गाड़ियों की टक्कर से उसमे सवार लोगो को चोट लगी होगी (मतलब)
उफफ्फ्फ्फ़ तत्काल घायलों के लिए कुछ करना चाहिए (भाव)
अभी एम्बुलेंस और पुलिस को फ़ोन सूचित करो (इरादा)

श्रोता कई बार वक्ता को केवल इसलिए नहीं समझ पाता क्योंकि वो ढंग से सुन ही नहीं रहा होता है. उसका ध्यान या तो बँटा हुआ होता है या कही और ही लगा होता है. लेकिन कई बार श्रोता इसलिए भी नहीं समझ पता क्योंकि वो वक्ता के वाक्य का तात्पर्य नहीं समझ पाता. वो उस स्तर पर नहीं बैठ कर सुन रहा होता है जिस स्तर पर वक्ता बोल रहा होता है. मसलन वक्ता वो तथ्यों को समझ लेता है पर भाव नहीं समझ पाता. श्रोता और वक्ता के वार्तालाप को विभिन्न स्तर पर समझ कर देखे.















































वक्ता का तात्पर्यश्रोता का कर्त्तव्यश्रोता के प्रश्नश्रोता का उद्देश्य
तथ्यसुचना प्रसारित करना सुचना को समझना और स्पष्टीकरण करनाकौन, क्यों, कब, कहाँ, क्या, कैसे सुचना का दिमाग में ठीक वैसा ही चित्र बनाना जैसा वक्ता कहना चाह रहा है.
मतलबश्रोता को समझानापुरे परिवेक्ष को संक्षिप्त भाव से समझनाक्या मैं सही समझ रहा हूँ ?
क्या आप ये ही समझाना चाह रहे है ?
समझने का प्रयास करना और वक्ता को इसका भरोसा दिलाना.
भावभावनात्मक तौर पर श्रोता से जुड़ना.वक्ता के हाव, भाव और उच्चारण के तरीके पर ध्यान देना इससे आपके दिल पर क्या बीत रही है / आपको कैसा लग रहा है. वक्ता की भावनाओ को समझ कर उनसे जुड़ना
इरादाउसकी जरुरत पर ध्यान दो.ध्यान से सुनने के बाद सोच समझ कर समाधान पर ध्यान केन्द्रित करना इस परिस्तिथि में क्या करना चाहिए और किससे मदद मिल सकती है. जाने की सामने वाला व्यक्ति क्या पाना चाहता है.



कबीर दास जी ने भी कहा है "कागा काको धन हरै, कोयल काको देत, मीठा बोल सुनाय के, जग अपनी करि लेत" तो मित्रो ये शब्दों का चयन और समझ का फेर ही है जो अर्थ का अनर्थ कर देता है. इस लेख से अगर किसी एक को भी प्रेरणा मिले और उसके व्यक्तित्व में अच्छे के लिए परिवर्तन होता है तो मैं समझूंगा की इस को लिखने में लगा मेरा समय सार्थक गया.

अगली कड़ी में : किसी भी चर्चा को बहस बनने से कैसे रोके ?

वक़्त नहीं - इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी में

हर ख़ुशी है लोगों के दामन में,
पर एक हंसी के लिए वक़्त नहीं.
दिन रात दौड़ती दुनिया में,
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं.

माँ की लोरी का एहसास तो है,
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं,
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं.

सारे नाम मोबाइल में हैं,
पर दोस्ती के लिए वक़्त नहीं
गैरों की क्या बात करें,
जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं.

आँखों में है सपने बड़े,
पर सोने का वक़्त नहीं,
दिल है ग़मों से भरा हुआ,
पर रोने का भी वक़्त नहीं,

पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े,
की थकने का भी वक़्त नहीं,
पराये एहसासों की क्या कद्र करें,
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नहीं,

तू ही बता ऐ ज़िन्दगी,
इस ज़िन्दगी का क्या होगा,
की हर पल मरने वालों को,
जीने के लिए भी वक़्त नहीं .......

संत कबीर के दोहे

कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। उनकी कविता का एक-एक शब्द पाखंडियों के पाखंडवाद और धर्म के नाम पर ढोंग व स्वार्थपूर्ति की निजी दुकानदारियों को ललकारता हुआ आया और असत्य व अन्याय की पोल खोल धज्जियाँ उडाता चला गया। कबीर का अनुभूत सत्य अंधविश्वासों पर बारूदी पलीता था। सत्य भी ऐसा जो आज तक के परिवेश पर सवालिया निशान बन चोट भी करता है और खोट भी निकालता है। आइये इस महान संत के कुछ अविस्मरणीय दोहो का आनंद ले :

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय ॥

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान |
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ||

सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज |
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ||

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये |
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ||

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर |
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ||

निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें |
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए ||

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय |
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ||

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय |
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ||

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे |
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ||

पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात |
देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात ||

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये |
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ||

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार |
फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ||

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब |
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ||

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग |
तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग ||

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप |
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप ||

जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान |
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण ||

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश |
जो है जा को भावना सो ताहि के पास ||

जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान |
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान ||

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए |
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए ||

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग |
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ||

तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार |
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ||

तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय |
सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए ||

प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए |
राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए ||

जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही |
ते घर मरघट जानिए, भुत बसे तिन माही ||

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत |
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||

उजल कपडा पहन करी, पान सुपारी खाई |
ऐसे हरी का नाम बिन, बांधे जम कुटी नाही ||

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही |
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ||

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए |
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ||

प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय |
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ||

प्रेम भावः एक चाहिए, भेष अनेक बनाये |
चाहे घर में बास कर, चाहे बन को जाए ||

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम |
कहे कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुना दाम ||

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर ॥

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय |
भागत के पीछे लगे, सन्मुख आगे सोय ||

मन दिना कछु और ही, तन साधून के संग |
कहे कबीर कारी दरी, कैसे लागे रंग ||

काया मंजन क्या करे, कपडे धोई न धोई |
उजल हुआ न छूटिये, सुख नी सोई न सोई ||

कागद केरो नाव दी, पानी केरो रंग |
कहे कबीर कैसे फिरू, पञ्च कुसंगी संग ||

कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर |
जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर ||

जाता है तो जाण दे, तेरी दशा न जाई |
केवटिया की नाव ज्यूँ, चडे मिलेंगे आई ||

कुल केरा कुल कूबरे, कुल राख्या कुल जाए |
राम नी कुल, कुल भेंट ले, सब कुल रहा समाई ||

कबीरा हरी के रूठ ते, गुरु के शरणे जाए |
कहत कबीर गुरु के रूठ ते, हरी न होत सहाय ||

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी |
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ||

कबीर खडा बाजार में, सबकी मांगे खैर |
ना काहूँ से दोस्ती, ना काहूँ से बैर ||

नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय |
कबीर शीतल संत जन, नाम सनेही होय ||

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय |
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ||

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय |
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय ||

शीलवंत सबसे बड़ा सब रतनन की खान |
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ||

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये |
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाए ||

माखी गुड में गडी रहे, पंख रहे लिपटाए |
हाथ मेल और सर धुनें, लालच बुरी बलाय ||

सुमिरन मन में लाइए, जैसे नाद कुरंग |
कहे कबीरा बिसर नहीं, प्राण तजे ते ही संग ||

सुमिरन सूरत लगाईं के, मुख से कछु न बोल |
बाहर का पट बंद कर, अन्दर का पट खोल ||

साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय |
ज्यों मेहंदी के पात में, लाली रखी न जाए ||

संत पुरुष की आरती, संतो की ही देय |
लखा जो चाहे अलख को, उन्ही में लाख ले देय ||

ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार |
हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ||

हरी संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप |
निश्वास सुख निधि रहा, आन के प्रकटा आप ||

कबीर मन पंछी भय, वहे ते बाहर जाए |
जो जैसी संगत करे, सो तैसा फल पाए ||

कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार |
साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ||

आये है तो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर |
इक सिंहासन चढी चले, इक बंधे जंजीर ||

ऊँचे कुल का जनमिया, करनी ऊँची न होय |
सुवर्ण कलश सुरा भरा, साधू निंदा होय ||

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय |
भक्ति करे कोई सुरमा, जाती बरन कुल खोए ||

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय |
मीठे वचन सुना के, जग अपना कर लेय ||

लुट सके तो लुट ले, हरी नाम की लुट |
अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेगे छुट ||


तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का, तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला, तिन का तिन के पास॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए,
माली सींचे सौ घडे, ऋतू आये फल होए

मांगन मरण सामान है, मत मांगो कोई भीख,
मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख

ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि.
मूरख लोग न जानिए , बाहर ढूँढत जाहिं

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये,
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये

शाकाहारियों में कैंसर का ख़तरा कम

ब्रिटेन में किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि शाकाहार से कैंसर से रक्षा में मदद मिल सकती है. अध्ययन के अनुसार शाकाहारी लोगों में मांसाहारी लोगों की तुलना में कैंसर के बहुम कम मामले देखे गए. ये अध्ययन ब्रिटेन में 52,700 पुरुषों और महिलाओं पर किया गया, जिनकी उम्र 20 से 89 वर्ष के बीच थी.

एक अमरीकी जनरल में ये अध्ययन प्रकाशित हुआ है और शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को काफ़ी अहम माना है.

अध्ययन करने वाली टीम ने लोगों को तीन समूहों में बांटा और मांस खाने वाले, मछली खाने वाले और शाकाहारियों का समूह बनाया.

अध्ययन में पाया गया है कि मछली खाने वालों और शाकाहारियों में मांस खाने वालों की तुलना में कैंसर के कम मामले पाए गए. हालाँकि इस अध्ययन के अनुसार शाकाहारियों में कोलोरेक्टल कैंसर के अधिक मामले देखे गए. शोधकर्ता इस नतीजे से चकित हैं क्योंकि ये पहले के अध्ययन के उलट हैं. पहले के अध्ययन के अनुसार कोलोरेक्टल कैंसर की मांस खाने वालों में अधिक संभावना रहती है.

अध्ययन टीम के प्रमुख प्रोफ़ेसर टिमके का कहना है कि इससे पहले किसी भी अध्ययन में आहार को इस तरह से प्रमुखता नहीं दी गई थी जिसकी वजह से बहुत सारा भ्रम है. उनका कहना था, " ये एक दिलचस्प अध्ययन है, ये इस बात के संकेत दे रहा है कि मछली और शाकाहारियों में कैंसर का ख़तरा कम हो सकता है. इसलिए हमे इसे सावधानी के साथ देखने की ज़रूरत है."

उनका कहना था, " ये अध्ययन इस बात का समर्थन नहीं करता कि शाकाहारियों में कोलोरेक्टल कैंसर के मामले कम पाए जाते हैं. इसलिए मैं समझता हूँ कि मांस इसके लिए कैसे ज़िम्मेदार हो सकता है. इस सिलसिले में सावधानी पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है. "

उन्होंने स्पष्ट किया है कि कैंसर और आहार के बीच संबंध स्थापित करने वाले इस अध्ययन पर और काम करने की आवश्यकता जो कि एक मुश्किल कार्य है.

एक रोचक लघु कथा

एक दिन एक कुत्ता जंगल में रास्ता भूल गया. तभी उसने देखा की एक शेर उसकी तरफ़ आ रहा है. कुत्ते की साँस सूख गई. उसने सोच "आज तो मेरा काम तमाम है". फिर उसने सामने कुछ सूखी हुई हड्डियाँ पड़ी देखी. वो आते हुए शेर की तरफ़ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हड्डी को चूसने लगा और जोर जोर से बोलने लगा "वाह शेर को खाने का मजा ही कुछ और है. एक और मिल जाए तो पुरी दावत हो जायेगी" और इतना कह कर उसने जोर से डकार मारा. इस बार शेर सकते में आ गया. शेर ने सोचा "ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है, जान बचा कर भागो" और शेर वहां से चंपत हो गया.

पेड़ पर बैठा एक बन्दर ये सब तमाशा देख रहा था. उसने सोचा ये मौका अच्छा है शेर को सारी कहानी बता देता हूँ, शेर से दोस्ती भी हो जायेगी और उससे जिन्दगी भर के लिए जान का खतरा भी दूर हो जाएगा. वो फ़टाफ़ट शेर के पीछे भगा. कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देखा और समझ गया की कुछ तो लोचा है. उधर बन्दर ने शेर को सब बता दिया की कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ बनाया है. शेर ज़ोर से दहाडा, "चल मेरे साथ अभी उसकी लीला ख़त्म करता हूँ" और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर शेर कुत्ते की तरफ़ लपका.

कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसकी तरफ़ पीठ करके बैठ गया और ज़ोर ज़ोर से बोलने लगा, "इस बन्दर को भेज के एक घंटा हो गया साला एक शेर फाँस कर नही ला सकता!"

सीख : मुसीबत में घबराओ नही बल्कि चतुराई से काम लो

कार्बन ट्रेडिंग क्या होती है

कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए क्योतो संधि में एक तरीक़ा सुझाया गया है जिसे कार्बन ट्रेडिंग कहते हैं. यानी कार्बन डाइऑक्साइड का व्यापार. ये योजना केवल विकसित देशों पर ही लागू है. इसमें होता ये है कि कोई विकसित देश किसी विकासशील देश में ऐसी योजना अपनाता है जिससे ग्रीन हाउस गैसों में कमी लाई जा सके. वह इसके लिए धनराशि और तकनीकि सहायता भी देगा और इससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में जो कमी आएगी उसका लाभ उसे मिलेगा. उदाहरण के लिए ब्रिटेन, भारत में कोयले की जगह सौर ऊर्जा की कोई परियोजना शुरु करे. इससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम होगा जिसे आंका जाएगा और फिर उसका मुनाफ़ा ब्रिटेन को मिलेगा

पेटेंट और कॉपीराइट में क्या अन्तर है.

पेटेंट एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत किसी भी नई खोज से बनने वाले उत्पाद पर एकाधिकार दिया जाता है. उसके बाद कोई भी उस उत्पाद को न बना सकता है न बेच सकता है. अगर बनाना चाहे तो उसे लाइसैंस लेना पड़ेगा और उसपर रॉयल्टी देनी होगी. इस पेटेंट की अवधि पहले हर देश ने अपने-अपने हिसाब से तय की हुई थी लेकिन अब विश्व व्यापार संगठन ने उसे बीस साल कर दिया है. इसके साथ प्रौसैस पेटेंट भी होता है जिसका संबंध नई प्रौद्योगिकी से है. किसी भी नई तकनोलॉजी पर भी पेटेंट लिया जा सकता है. हरेक देश में पेटेंट कार्यालय हैं. अपने उत्पाद या तकनोलॉजी पर पेटेंट लेने के लिए इस कार्यालय में अर्ज़ी दें और साथ ही अपनी नई खोज का ब्योरा दें. उसके बाद पेटेंट कार्यालय उसकी जांच करेगा और अगर वह उत्पाद या तकनोलॉजी नई है तो पेटेंट का आदेश जारी कर देगा. लेकिन पेटेंट का ये आदेश जिस देश में जारी किया जाता है उसकी सीमाओं के भीतर ही लागू माना जाता है. जहां तक कॉपीराइट का सवाल है तो कॉपीराइट किसी मौलिक लेखन, संगीत, कलाकृति, डिज़ाइन, फ़िल्म या तस्वीरों पर होता है.

सिक्स्थ सेंस यानी छठी इंद्री को जागृत करने का क्या उपाय है

यह परामनोविज्ञान का विषय है। कुछ लोगों में ऐसी क्षमताएँ पाई गई हैं जिनकी व्याख्या करना मुश्किल होता है. जैसे भविष्य की घटनाएं देख पाना, लोगों के बारे में ऐसी जानकारी पा जाना जिसे सामान्य रूप से जानना संभव नहीं, मीलों दूर बैठे किसी व्यक्ति की बात सुन या एक जगह होते हुए किसी और जगह पहुंच पाना. लेकिन क्योंकि यह विज्ञान का विषय नहीं है इसलिए इसे प्रमाणित करना भी मुश्किल है. इसे ऐक्स्ट्रा सैन्सरी परसैप्शन या अतिरिक्त संवेदी बोध का नाम दिया गया है. यानि वह बोध जो हमारी पाँच इंद्रियों के बोध से परे है. इस पर बहुत से अध्ययन हुए हैं और हो रहे हैं लेकिन इसे मानने वालों और न मानने वालों के बीच बहस जारी है.

जब हम घबराते हैं तो हमें पसीना क्यों आता है.

जब हम डरते या घबराते हैं तो हमारा मस्तिष्क, हमारे केंद्रीय स्नायु तन्त्र या सैंट्रल नरवस सिस्टम को चौकन्ना कर देता है जिससे हमारी नाड़ियां सक्रिय हो उठती हैं और हमारे ऐड्रिनल ग्लैंड या अधिवृक्क ग्रन्थि से ऐपाइनफ़्राइन का रिसाव होने लगता है. इनसे हमारे पसीने की ग्रंथियाँ सक्रिय हो उठती हैं और हमें पसीना छूटने लगता है. हमारे शरीर में पसीने की कोई 50 लाख ग्रंथियाँ हैं. इनमें से अधिकांश हमारी हथेली में हैं. और बाकी की ग्रंथियों में से अधिकतर हमारी बगल और पैरों के तलवे में हैं.

टेलीपैथी क्या होती है

टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के उस तबादले को कहते हैं जिसमें हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता. यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं होता है. टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फ़्रैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था. कहते हैं कि जिस व्यक्ति में यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है. यह परामनोविज्ञान का विषय है जिसमें टेलीपैथी के कई प्रकार बताए गए हैं. लेकिन इसे प्रमाणित करना बड़ा मुश्किल है. इस क्षेत्र में बहुत से प्रयोग हो चुके हैं लेकिन संशय करने वालों का तर्क है कि टेलीपैथी के कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिल सके हैं. कुछ लोग टैक्नोपैथी की बात करते हैं. उनका मानना है कि भविष्य में ऐसी तकनोलॉजी विकसित हो जाएगी जिससे टेलीपैथी संभव हो. इंगलैंड के रैडिंग विश्वविद्यालय के कैविन वॉरिक का शोध इसी विषय पर है कि किस तरह एक व्यावहारिक और सुरक्षित उपकरण तैयार किया जाए जो मानव के स्नायु तंत्र को कंप्यूटरों से और एक दूसरे से जोड़े. उनका कहना है कि भविष्य में हमारे लिए संपर्क का यही प्रमुख तरीक़ा बन जाएगा.

गंगा नदी का उद्गम स्थान कौन सा है और गंगा की लम्बाई कितनी है

गंगा नदी हिमालय में गंगोत्री ग्लेशियर से निकलकर 2510 किलोमीटर की यात्रा करती हुई बंगाल की खाड़ी में जा समाती है. गंगा के उद्गम स्थान को गोमुख कहते हैं लेकिन उस समय वह भागीरथी के नाम से जानी जाती है. उधर सतोपंत और भागीरथ खड्ग ग्लेशियर से निकलती है अलकनंदा. विष्णुप्रयाग में अलकनंदा में मिलती है धौलीगंगा, नंदप्रयाग में नंदाकिनी, कर्णप्रयाग में पिंडर और रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी. इसके बाद देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी मिलती हैं जहां से वह गंगा कहलाती है

हिंदू विवाह संस्कार में सात फेरे क्यों लगाए जाते हैं और इनका क्या महत्व है

हिंदू विवाह संस्कार के अंतर्गत वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर पति-पत्नी के रूप में एक साथ सुख से जीवन बिताने के लिए प्रण करते हैं और इसी प्रक्रिया में दोनों सात फेरे लेते हैं, जिसे सप्तपदी भी कहा जाता है. और यह सातों फेरे या पद सात वचन के साथ लिए जाते हैं. जिसमें पहला वचन होता है, पति-पत्नी को जीवन भर पर्याप्त और सम्मानित ढंग से भोजन मिलता रहे, दूसरा दोनों का जीवन शांतिपूर्ण और स्वस्थ ढंग से बीते, तीसरा दोनों अपने जीवन में आध्यात्मिक और धार्मिक दायित्वों को निभा सकें, चौथा फेरा इस वचन के साथ लिया जाता है कि दोनों सौहार्द्र और परस्पर प्रेम के साथ जीवन बितायें, पाँचवे फेरे का वचन होता है विश्व का कल्याण हो और संतान कि प्राप्ति हो, छठे में प्रार्थना की जाती है कि सभी ऋतुएं अपने अपने ढंग से समुचित धनधान्य उत्पन्न करके दुनिया भर को सुख दें क्योंकि सभी के सुख में दंपत्ति का भी भला होता है और सातवें फेरे में पति-पत्नी परस्पर विश्वास, एकता, मतैक्य और शांति के साथ जीवन बिता सकें. इन सात फेरों के साथ लिए वचनों में अपने और विश्व की शांति और सुख की प्रार्थना की जाती है.

शर्म आने पर चेहरा लाल क्यों हो जाता है

लजाना एक संवेग है जिसका संबंध संकोच शीलता से है. संकोच का अनुभव होते ही हमारी अधिवृक्क ग्रन्थि से, ऐड्रिनलीन का स्राव होने लगता है. इससे ऐडेनिलिल साइक्लेज़ नामका ऐन्ज़ाइम क्रियाशील हो उठता है, जिसके फलस्वरूप साइक्लिक एऐमपी का स्तर बढ़ जाता है. साइक्लिक एऐमपी का स्तर बढ़ने से रक्त वाहिकाएं फैल जाती हैं और हमारे चेहरे का रंग गुलाबी या लाल हो जाता है. शरीर के दूसरे हिस्सों की तुलना में हमारे गालों में रक्त वाहिकाएं अधिक होती हैं, वो अधिक मोटी होती हैं और सतह के अधिक समीप होती हैं इसलिए उनका असर साफ़ दिखाई देने लगता है.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स क्या है

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (आईएफपीआरआई) का ग्लोबल हंगर इंडेक्स (विश्व भुखमरी सूचकांक) निकालने के लिए बच्चों के कुपोषण, बाल मृत्यु दर और समुचित कैलोरी से वंचित लोगों की संख्या को आधार बनाया जाता है संस्थान का ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2008 बताता है कि भारत में भूख की समस्या चिंताजनक स्थिति में पहुंच गई है। इस मामले में भारत की हालत अफ्रीका के सहारा क्षेत्र के करीब 25 देशों से भी बदतर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में देश के किसी भी राज्य को 'गंभीर' के स्तर से कम नहीं आंका गया है. लेकिन कहीं कोई नेता उफ करता हुआ सुनाई नहीं दे रहा. मध्य प्रदेश में भूख की स्थिति अत्याधिक चिंताजनक है और उसकी गंभीरता का स्तर उतना ही है जितना कि इथोपिया या चाड में. महाराष्ट्र में भी स्थिति चिंताजनक है लेकिन वहां उत्तरी भारत या हिंदी भाषी लोगों को बाहर खदेड़ना शायद चिंता का ज्यादा गंभीर मुद्दा था.

मौन और चुप्पी का फर्क

मौन और चुप्पी में ये फर्क है कि चुप्पी बाहर होती है, मौन भीतर घटता है। जीवन के अनेक अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर मौन में मिल जाता है। संसार से संबंधित सवालों का जवाब संसार में ही मिल जाता है, परंतु जीवन से जु़ड़े प्रश्नों का उत्तर मौन से प्राप्त होता है। हमारे विचारों का प्रवाह नदी की तरह है, इस पर बांधा जाए मौन का बांध। जैसे बांध के कारण उसके रिजरवॉयर में गहराई होती है, उससे सिंचाई होती है और ऊर्जा प्राप्त की जाती है, वैसे ही मौन होने पर विचारों से उच्च परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। आप जितना मौन में रहेंगे आपके ज्ञान और बुद्धिमत्ता का संतुलन उतना बढ़ता जाएगा। मौन से प्राप्त शक्ति के बाद जब आप मुस्कुराते हैं तो केवल होंठ ही नहीं, पूरा व्यक्तित्व मुस्कुराता है। यदि प्रार्थना कर रहे होते हैं तो वह केवल शब्दों में नहीं हर सांस से प्रार्थना होने लगती है। हम बहुत कुछ करते हैं और फिर भी लगता है करने वाला कोई और है। एक और अच्छी बात यह भी होती है कि हमारे मौन से दूसरों को बोलने का मौका मिलता है जिस कारण हमें अधिक से अधिक जानकारी भी सहजता से उपलब्ध हो जाती है। इतना भाषण, लो मेरा मौन टूट गया ☺