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क्यों पाले हम आस्तीन में सांप

बचपन में जब कहावत सुना करते थे तो कभी अहसास ही नहीं हुआ की हमारे पूर्वज लोगो ने इनमे कैसे "गागर में सागर" भर इन एक दो पंक्तियों से कितने ज्ञान की बाते आने वाली पीढ़ी के लिए लिख छोड़ी है.

आपने और हम सबने सुना है "यथा राजा तथा प्रजा". आज देश के नेता ही देश के राजा है और इन लिफाफों को देख कर ही मजमून का अंदाज़ा लग जाता है. यद्यपि ये बात बिलकुल सही है की सौ करोड़ की आबादी में सब एक सरीखे नहीं हो सकते लेकिन अधिकतर लोग क्या चाहते है उसका तो अंदाजा हो ही जाता है हमारे इन जनप्रतिनिधियों को देख कर. हमारे देश के ये जयचंद या फिर संसद में जानवरों के झुण्ड सा बर्ताव करती शिखंडियो की इस फौज ने देश के जनता को भी शिखंडी ही बना छोड़ा है.

मुद्दे पर आते है. आज इनकी बेवकूफी भरी एक और खबर पढ़ी और पढ़ कर खून खौल उठा. कल यानि गुरूवार को भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तानी प्रधान मंत्री युसुफ़ रज़ा गिलानी से फ़ोन पर बातकर पाकिस्तान में आई विनाशकारी बाढ़ में मदद की पेशकश दोहराई थी. उस के बाद पाकिस्तानी सरकार ने भारत की मदद स्वीकार करने का फ़ैसला किया. उल्लेखनीय है की करीब एक हफ़्ते पहले भारत सरकार ने पाकिस्तान के लिए 50 लाख डॉलर की रकम बतौर मदद देने की पेशकश की थी जिसके जवाब में पाकिस्तानी सरकार ने भारत का शुक्रिया तो अदा किया था लेकिन इस मदद को स्वीकार करने पर सोच विचार करने की बात कही थी. न्यूयॉर्क में पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने भारत सरकार की तारीफ़ की और कहा, “पाकिस्तान ने उसूली तौर पर भारत की मदद की पेशकश को क़बूल करने का फ़ैसला कर लिया है."

हम सब जानते है कि इन दिनों पाकिस्तान में प्रकृति का प्रकोप बरसात के रूप में कहर बन कर बरस रहा है. दिन प्रतिदिन हालत बद से बदतर हो रहे है और लाखो की संख्या में लोग प्रभावित हुए है. अमेरिका पोंगा पंडित बन कर इस बार भी अपने स्वयं की स्वार्थ पूर्ति के लिए पाकिस्तान को आने दो आने की लोलीपोप दे रहा है और दुसरे देशो से भी इसी तरह की भीख देने को कह रहा है.

वैसे भी कहते है कि "दान भी पात्र देख को कर ही दिया जाता है". ये बात जरुर विचारणीय है कि क्या पाकिस्तान वाकई मदद का हक़दार है. ज्ञातव्य रहे मैं यहाँ पर वहां के आम नागरिक की बात नहीं कर रहा हूँ. वैसे भी भारत और पाकिस्तान जैसे देशो में जो पैसा आम जनता की मदद के लिए आता है, उसमे से कितना आम लोगो के लिए कितना इस्तेमाल होता है ये मुझे और आपको समझने और समझाने की जरुरत नहीं है. तो साहब बात हो रही थी कि क्या ये पडोसी देश इस लायक है कि इसकी मदद करी जाए.

मदद भी उसकी की जाती है जिसको उस मदद की जरुरत हो क्योंकि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती. उदहारण के लिए हाल ही में संपन्न हुई भारत पाक वार्ता को ले. जिसने भी पिछले महीने हमारे नपुंसक विदेश मंत्री एस एम् कृष्णा और शाह महमूद क़ुरैशी की प्रेस कांफ्रेंस देखी हो वो ये साफ़ तौर पर कह सकता है कि शाह महमूद क़ुरैशी "चोरी और सीना जोरी " वाली कहावत को और हमारे विदेश मंत्री "खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे" को चरितार्थ करते दिख रहे थे.

समझ नहीं आता कि जो देश अमेरिका को उल्लू बना कर के उसके पैसे लगातार खा रहा है और डकार भी नहीं ले रहा उसको सहायता देने के लिए भारत क्यों इतनी मिन्नतें कर रहा है. क्या पाकिस्तान ने कभी पडोसी देश का धर्म निभाया है. आज पिछले कुछ सालो से जिस आतंकवाद से पूरी दुनिया त्रस्त है भारत ने तो अपने पडोसी देश की मेहरबानी से उस आतंक के दानव को कई दशको से सहा है. बंटवारे के चौबीस साल में ही तीन बार युद्ध कर के जब वो ये समझ गया कि इन रणबांकुरो को हराना नामुमकिन है तो उसने आतंकवाद, कारगिल, कसाब, दाउद, जाली नोट, हथियार, तस्करी जैसे छद्म रूप से भारत देश पर हमला बोल दिया.

हाल ही में जब ब्रितानी प्रधामंत्री डेविड केमरून ने बंगलौर में दो टूक शब्दों में कहाँ कि पाकिस्तान एक हाथ से मदद की भीख और दुसरे खून सने हाथ से आतंक का समर्थन नहीं कर सकता तो पाकिस्तान के सत्ता के गलियारों में बैठे कई लोगो के इधर उधर और जाने किधर किधर से धुना निकलने लगा. उस समय इन्ही पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने तत्काल कहाँ कि पाकिस्तान ने आतंक के खिलाफ लड़ाई में अपने कई सैनिक खोए है इसलिए पाकिस्तान पर आतंक के विरुद्ध कार्यवाही में संदेह नहीं किया जाना चाहिए. इस तर्क से तो शायद कल को कोई तालेबानी प्रवक्ता भी कह सकता है कि तालेबान ने भी लड़ाई में अपने बहुत से लोग खोये है इसलिए तालिबान को भी शांति का पुजारी ही माना जाना चाहिए.

समझ नहीं आता कि क्यों हम अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारने को क्यों इतने बेताब है, क्यों बेताब है उसकी मदद करने के लिए जिसने हमेशा ही भारत की पीठ में छुरा घोंपा है. अरे भाई क्या हमारे देश की सारी समस्याए हल हो गई है जो आप पडोसी को पचास लाख डालर की मदद कर रहे हो. समझ नहीं आता कि आप पैसा दे रहे हो या ले रहे हो.

मन्नू भाई अगर आपके खजाने में इतना पैसा है तो उसको देश से गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और बेरोजगार मिटाने में लगाइए , लेह में हुए नुकसान की भरपाई में लगाइए, भ्रष्टाचार के निर्मूलन में लगाइए, ढाई दशक से मदद की बाट देखते हुए बचे खुचे भोपाल गैस कांड के पीडितो को न्याय दिलवाने में लगाइए, देश में सड़ रहे अनाज को बचाने में लगाइए, सरकारी दफ्तरों में कार्य को चुस्त बनाने और पारदर्शिता लाने के लिए लगाइए, जर्जर न्यायपालिका को कार्यकुशल बनाने में लगाइए. इसके बाद जो बच जाए उससे देश का कर्ज चुकाइए. फिर भी कुछ बच जाए तो उससे देश का भविष्य सुधारने में लगाइए. मेहरबानी करके आस्तीन में सांप मत पालिए. उस विष के बीज मत बोइये जो कल विष बेल बन कर हमारा और आने वाली पीढियों का नुकसान करे.

कैसे बने हमारे सपनो का भारत

हिंदी ब्लॉग जगत पर वैसे तो कई दिग्गज और धुरंधर है जो अपनी लेखनी से अपने विचारों का नियमित रूप से प्रसार करते है। राजीनीति, धर्म, यात्रा, संस्मरण आदि सब विषयों पर अक्सर कुछ सार्थक गद्य और पद्य पढ़ने को मिल जाता है ।

लेकिन हाल ही में इन सब से हटकर सर्वप्रथम अजित जी का लेख पता नहीं हम अपने देश भारत से नफरत क्‍यों करते हैं? पढ़ा. उसके बाद उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए खुशदीप जी ने अपने ब्लॉग देशनामा में भारत तो आखिर ठीक कौन करेगा ? लिखा. इन लेख को पढ़ कर लगा कि मूल समस्या से तो हम सब वाकिफ है लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या इसका कोई समाधान है और यदि है तो क्या उसे अमलीजामा पहनाया जा सकता है ? बस इसी सोच पर मैंने अपने कुछ विचार व्यक्त किये है.

जैसा की हम सब जानते है देश में लोकतंत्र के चारो स्तंभ आज जर्जर हालत में है. हमारे ही द्वारा चुने गए लुटेरे (जिनको हम नेता या जनप्रतिनिधि कहते है) खुले आम भ्रष्टाचार, अय्याशी, लूटपाट इत्यादि का तांडव खेल रहे है. ऊपर से नीचे तक गंदगी फैली हुई है. हर कोई अपनी जेब भरने में लगा है. आजादी के बासठ साल में ही देश का सत्तर लाख करोड रुपया स्विस बैंक में जा चुका है. ये राशि वहाँ के बैंको में जमा अन्य सभी देशो की कुल जमा राशि से भी अधिक है. देश में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है. चूँकि आज देश में चोर, लुटेरे खुले आम सीना तान कर बिना सजा के घूम रहे है, इसलिए उनसे सीख ले कर अन्य लोग भी गलत रास्ते पर चलने में घबराते नहीं है.

ऐसे में आम आदमी के दिल में हमेशा ये सवाल कौंधता है कि क्या कुछ ऐसा किया जाए कि सबको उनका हक के हिसाब से पारितोषिक मिले और आम जनता अपना जीवन सकून बसर कर सके.

केवल शिक्षा के द्वारा इस बीमारी को ठीक करने की सोचना ठीक वैसा ही है जैसे की कैंसर के लिए एस्प्रिन लेना. मेरा ये मानना है कि शिक्षित होना और समझदार होने में फर्क है. शिक्षा से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है लेकिन उस ज्ञान को व्यक्ति कैसे उपयोग करता है इससे ही उस व्यक्ति की समझदारी झलकती है. देश में आज Civic Sense की कमी है, जो अफ़सोस किसी स्कूल या कॉलेज में नहीं पढाया जाता बल्कि ये समाज से उपजता है. आज हर कोई इस आपाधापी में लगा है कि दूसरे को उल्लू बना कर कैसे अपना उल्लू सीधा किया जाये. मुझे नहीं लगता कि केवल पढ़ लिख कर या सबको केवल स्नातक, इंजिनियर, डॉक्टर बना देने से ये समस्या हल हो जायेगी. पिछले पचास साल में देश में इतने शिक्षित लोग बढे है लेकिन क्या भ्रष्टाचार पर कुछ लगाम नहीं लगी और न ही इसमें थोड़ी सी भी कमी आई ? आज पढ़ा लिखा व्यक्ति कमा कर खा सकता है लेकिन जीवन में सफल हो ये जरुरी नहीं है. मेरे विचार से देश को अगर ठीक रास्ते पर लाना है तो :


१. हमें व्यवसाय सम्बंधित शिक्षा पर जोर देना होगा ताकि पढ़ लिख कर युवा नौकरी का मुंह ताकने की बजाये आज का युवा खुद एक छोटा मोटा उद्यमी बन सके. हमारे देश में हर IIT, IIM, ISB, अभियांत्रिकी और मेडिकल कोलेज इत्यादि संस्थानों को अपने छात्रों को दो साल तक अनिवार्य रूप से गांव में जा कर के तकनीक और व्यापार स्थापित करने और अपनी सेवाए देने के बाद ही डिग्री प्रदान करनी चाहिए. आम लोगो को शिकायत रहती है कि कुशाग्र बुद्धि वाले ये छात्र देश में पढ़ लिख कर बाहर दूसरे देशो की अर्थव्यवस्थाओ में योगदान देते है, लेकिन अपने देश पर ध्यान नहीं देते. छात्रों को ये शिकायत होती है कि अपने ही देश में उन्हें उनकी काबिलियत का न तो वाजिब सम्मान नहीं मिलता है और न ही अपनी कुशलता को दिखाने के मौके. वे अगर देश में रुक भी जाए तो सरकारी लाल फीताशाही में फंस कर रह जाते है, और कुछ कर नहीं सकते. अफ़सोस दोनों ही अपनी जगह बिल्कुल सही है.
इसी तरह विज्ञानं, वाणिज्य और कला संकाय के छात्रों को भी दो साल तक सरकारी, गैर सरकारी संघठनो के साथ काम करने के बाद डिग्री मिलनी चाहिए. यहाँ भी प्रतिस्पर्धा बनाये रखने के लिए कुछ छात्रों को एक कार्य दिया जाए और ये देखा जाए कि किसने कितने गुणवत्ता के साथ कार्य को पूरा किया या कितनी सुगमता से मुश्किल को हल किया. छात्रों को ये अहसास कराया जाए कि वो देश कि प्रगति में योगदान दे रहे है और उन्हें इसके लिए गौरान्वित किया जाए.



२. नेताओ की जवाबदेही तय हो. अगर वो उस मापदंड पर या चुनाव से पहले किये हुए अपने किये हुए अपने वादों को पूरा नहीं कर पाते तो उस व्यक्ति या उसके परिवार में किसी को नेता के टिकट के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाए.

३. गलती से सीख लेते हुए जितना हो सके तकनीक का उपयोग कर सरकार को जनता को सेवा प्रदान करे . अफ़सोस आज भी तेलगी जैसे बड़े कांड के बाद हम कागज के स्टेम्प पेपर को प्रयोग में लाते है न कि इलेक्ट्रोनिक स्टाम्प पेपर. चूँकि हर गतिविधि इलेक्ट्रोनिक होगी तो इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार में कमी आएगी. इस काम के लिए देश की बड़ी बड़ी कंपनिया जैसे इनफ़ोसिस, टाटा कंसल्टेंसी इत्यादि की सेवा देश में इलेक्ट्रोनिक सेवा स्थापित करने के लिए ली जाए.

४. सभी सरकारी संस्थानों में पूर्ण कालिक नियुक्ति की बजाये दो या तीन साल के लिए अनुबंधन पर नौकरी दी जाए जो कार्यकुशलता के हिसाब से नवीकृत की जाए. प्रत्येक व्यक्ति जो सरकारी विभाग जैसे पुलिस, बिजली, जल विभाग से सेवा लेता है उन्हें अपना कार्य पूरा होने के बाद एक फॉर्म दिया जाए जिस पर वो विभाग की सेवा से कितना संतुष्ट है ये बतला सके. उस प्रतिपुष्टि (फीडबैक) के द्वारा उस विभाग का बजट तय किया जाए और प्रत्येक अधिकारी की तनख्वाह, पदोन्नति, बोनस इत्यादि तय किये जाए.

५. न्यायलय हर मामले में विशेषकर संगीन भ्रष्टाचार के मामलो के निपटारे में एक निश्चित समय सीमा निर्धारित करे . गलत सबूत पेश करने पर और झूठी गवाही देने वालो को सजा और झूठी गवाही उन्हें दिलवाने वाले वकील को दुगनी सजा दी जाए. साथ ही पेशे के साथ बेईमानी करने के लिए उन्हें भविष्य में वकालत करने पर रोक लगा दी जाए. इलेक्ट्रोनिक तथ्य जैसे विडियो, फोन, ई-मेल इत्यादि को पुख्ता सबूत माना जाए.


वैसे करने को बहुत कुछ है लेकिन अन्तोगत्वा सवाल फिर ये ही आता है कि ये करे कौन. क्योंकि जिनको ये करने का जिम्मा दिया जाता है वो रक्षक आज खुद ही भक्षक बन बैठे है. आम आदमी बिना दांत और नाख़ून के ये कैसे सुनिश्चित करे कि इस तरह की योजनाओ का क्रियान्वन हो, शायद ये ही अब आज का यक्ष प्रश्न है.

आइपीएल के बहाने भ्रष्टाचार पर एक नज़र


चलिए तीन साल बाद या यूँ कहने थरूर प्रकरण के बाद सरकारी एजेंसीयो ने आइपीएल में लगे पैसे की सुध तो लेने की सोची. देखिये जैसे जैसे परत खुलेगी कितने दोयम दर्जे के नेता इस हमाम में नंगे नजर आयेंगे. दोयम दर्जे के इसलिए क्योंकि जो अव्वल दर्जे के छंटे हुए गुंडे बदमाश (इसे नेता पढ़ा जाए) है वो तो जांच एजेंसी को अपनी जेब में रखते है और इस घपले में अपना नाम कभी भी सार्वजनिक नहीं होने देंगे.

आउटलुक पत्रिका में छपे एक लेख के अनुसार देश में १९९२ से २००८ तक भारत देश में ७३ (73) लाख करोड़ रूपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए है. ये धांधली का पैसा हमारे देश के ५३ (53) लाख करोड़ के सकल घरेलु उत्पाद से २७% (27%) ज्यादा है. भ्रष्टाचार के प्रति हम लगभग पूर्ण रूप से उदासीन है. देश ने आज इस कैंसर रूपी रोग के साथ रहना अपनी नियति मान लिया है. लेकिन अगर इस पैसे का सही जगह उपयोग होता तो शायद देश की तस्वीर ही कुछ और होती. क्या आप जानते है भ्रष्टाचार के इतने पैसे से :

देश में तीस लाख रूपये के लागत से २.४ (2.4) करोड़ प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोले जा सकते थे. यानि देश के हर गाँव में ३ चिकित्सा केंद्र.

पांच लाख रूपये प्रत्येक की लागत से १४.६ (14.6) करोड़ निम्न / मध्य वर्गीय मकान बन सकते थे.

३.०२ (3.02) करोड़ रुपयों की लागत से २४.१ (24.1) केंद्रीय विद्यालय बन सकते थे जिसमे प्रत्येक में कक्षा छ से बारह तक के दो खंड या सेक्शन हो सकते थे.

सम्पूर्ण भारत देश के परिधि को ९७ (97) बार चक्कर काटते हुए १४.६ (14.6) लाख किलोमीटर की सड़क बन सकती थी.

हर साल १,२०० (1,200) करोड़ रूपये व्यय करके, देश की पचास प्रमुख नदियों की अगके १२१ (121) सालो तक सफाई हो सकती थी.

२,७०० (2,700) करोड़ रूपये के लागत से ६०० (600) मेगा वाट के २,७०३ (2,703) कोयले के पॉवर प्लांट लग सकते थे.

८१,१११ (81,111) करोड़ रूपये खर्च करके, ९० (90) नारेगा जैसी योजनाये चलाई जा सकती थी.

६०,००० (60,000) करोड़ रूपये खर्च करके, देश के सारे किसानो के ऋण १२१ (121) बार माफ़ किये जा सकते थे.

देश के प्रत्येक नागरिक को करीब ५६,००० (56,000) रूपये दिए जा सकते थे. या या फिर गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक लाख अस्सी हज़ार रूपये दिए जा सकते थे.

७० (70) करोड़ लोगो को ७० (70) करोड़ नैनो दी जा सकती थी या २८० (280) करोड़ लैपटॉप बांटे जा सकते थे.

भ्रष्टाचार देश के लिए कोई नई बात नहीं है. स्विस बैंक में भारतीयों का कुल 1456 बिलियन डालर (जी हां एक लाख पैतालीस हज़ार छ सौ करोड़ डालर) का काला पैसा जमा है जो वहां के सारे बैंको में जमा अन्य सब देशो के कुल जमा पैसो से भी ज्यादा है. ये राशि भारत के कुल ऋण से 13 गुना ज्यादा है. यानि की इस राशि से भारत न केवल कर्ज मुक्त हो सकता है बल्कि कुल ऋण से बारह गुना ज्यादा राशि अपने पास रख सकता है. अन्यथा इस पैसे से 45 करोड़ लोगो में एक लाख रुपया भी बांटा जा सकता है. रूस जो स्विस बैंक जमा राशी में दुसरे स्थान पर है उसका कुल जमा 47,000 करोड़ डालर है जो भारत की जमा राशि से चार गुना कम है.

यहाँ सोचने वाली बात ये है कि आईपीएल को पारर्दर्शी होने के की बात थरूर के इस्तीफ़े के बाद से इतनी तेज क्यों हो गई है. यह सब काम तो थरूर का नाम जुड़ने से पहले भी ऐसे ही चल रहा था. दरअसल ये और कुछ नहीं, ललित मोदी पर लगाम कसने के लिए सरकार के इशारे पर की जा रही कार्रवाई के सिवा और कुछ नहीं है. इससे एक बात तो तय लग रही है कि मोदी के इस्तीफ़े के बाद मामला शांत हो जाएगा क्योंकि अगर बात आगे बढती है तो फिर क्या शरद पंवार क्या प्रफुल्ल पटेल, सब के सब लपेटे में आ जायेंगे.

एक अनुमान के अनुसार आइपीएल करीब 2000 करोड़ रूपये का घोटाला बतलाया जा रहा है. देश में इससे पहले और इससे कई बड़े भ्रष्टाचार के काण्ड हुए है जिनमे मुख्य है सत्यम 8000 करोड़, हर्षद मेहता 4000 करोड़, मधु कोड़ा 2000 करोड़, केतन मेहता 1500 करोड़, सी आर भंसाली 1200 करोड़, लालू चारा घोटाला 950 करोड़, दिनेश डालमिया 600 करोड़, उदय गोयल 210 करोड़ और अब्दुल करीम तेलगी 175 करोड़. इन सब केस में आज तक देश की किस अदालत ने किसी भी शामिल व्यक्ति का कुछ उखाड़ लिया जिससे की आम आदमी आज देश की न्यायप्रणाली पर विश्वास रखे.

अगर गुंडे छाप नेता लोग सचमुच में भ्रष्टाचार को मिटाना चाहते है, जिसकी कोई उम्मींद नहीं है, तो केवल आईपीएल जैसी छोटी मछली का तमाशा बनाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला. उन्हें देश को उपरोक्त सभी गबन हुए पैसे का न केवल हिसाब देना पड़ेगा बल्कि ये भी सुनिश्चित करना पड़ेगा कि दुबारा ऐसी कोई घटना नहीं हो. खैर वैसे होना तो बहुत कुछ चाहिए मगर जिस तरह से नेताओं के नाम इन काण्ड से जुड़े हुए होते हैं, उसकी वजह से हर बार ये जो बात निकली है वो दो दिन में अढाई कोस चल कर टाय टाय फिस्स हो जाती है, और ऐसा ही कुछ अब भी होता दिख रहा है।
(चित्र साभार : गूगल)

दोहरे चरित्र वाला देश का तथाकथित प्रजातंत्र

दृश्य एक :
दिनांक : १७ दिसम्बर २००९.
स्थान : किंग क्रोस स्टेशन, इंग्लैंड.
समय :सुबह के दस बजकर पेंतीस मिनिट.
दस बजकर पैतालीस मिनिट पर इसी किंग्स क्रोस स्टेशन से चलकर नोरफ्लोक के किंग लिन स्टेशन तक जाने वाली रेल गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर ग्यारह पर खड़ी है. तभी इस गाडी के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में इंग्लैंड की ८३ (तेरासी) वर्षीया महारानी एलिज़ाबेथ अपने एक सुरक्षाकर्मी के साथ पौंड £४४.४० का टिकट खरीद कर सफ़र करने के लिए बिना किसी तामझाम के, आम आदमी के साथ सफ़र करने के लिए चढ़ती है. महारानी जो अपने क्रिसमस या बड़े दिन की छुट्टी मनाने जा रही थी, उन्होंने एक आम व्यक्ति की तरह खिड़की के पास की सीट पर जगह ली और फिर वही से बैठ कर गाड़ी के चलने का इंतज़ार करने लगी. गाड़ी सही समय पर चली और समय पर ही अपने गंतव्य स्थान पर पहुंची. गाडी के गंतव्य स्थान पर पहुँचने के बाद महारानी अपनी सीट पर ही बैठी रही, उन्होंने सब लोगो के उतरने का इंतज़ार किया और उसके बाद वो उतर कर अपनी कार से सात मील दूर अपने महल पहुँच गई. महारानी और उनके परिवार वालो ने पहले भी कई बार ट्रेन ली है और बकिंघम पैलेस के प्रवक्ता के अनुसार रानी और उनका शाही परिवार साल में कई बार नियमित रेल सेवा का उपयोग आम आदमी की तरह करता है.

दृश्य दो :
स्थान : इंदिरा गाँधी हवाई अड्डा.
समय : सुबह के ११:३०.
मेरी घरेलु उड़ान एक घंटे की देर से चलने की उद्घोषणा हो रही है. तभी देखा करीब दस बारह बंद गेट की तरफ बड़े जा रहे थे. उनमे से कुछ हवाई अड्डे के कर्मचारी थे जिनके गले में टेग था. इन सबके बीच में एकदम नज़र पड़ते ही देख की आज़ाद भारत के सरकार की पंद्रहवीं लोकसभा के मंत्रीमंडल में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग में मंत्री जी कुर्ते पायजामे में चल रहे है. साथ में एक दो शायद IAS अफसर रहे होंगे जो फाइल और एक छोटा बैग पकडे पकडे चल रहे थे. थोडा आगे बढ़ते ही एक आदमी ने इशारा किया और गेट पर खड़े सिपाही ने तत्काल गेट का दरवाजा खोल कर सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया. विमानतल पर उतरते ही एक SUV आ गई और किसी ने दरवाजा खोल दिया. नेताजी बात करते हुए एक कदम आगे ही बढे थे की वो समझ गया साहब दूसरी तरफ बैठना चाहेंगे और तत्काल दूसरा दरवाजा भी स्वत ही खुल गया. साहब ने आसन ग्रहण किया और एक व्यक्ति आगे बैठ गया. SUV विमान की तरफ बढ़ने लगी ही थी की तभी एक वेन आ गई और विमतल के कर्मचारी उस में सवार हो कर साहब को विमान में बैठने के लिए उस SUV के पीछे पीछे हो लिए.

दृश्य तीन :
दिल्ली जाने वाला विमान अब उड़ान भरने को तैयार है. यात्रियों से निवेदन की तुरंत सुरक्षा जांच करवा के विमान की और प्रस्थान करे. एक घंटे बाद भी विमान वही खड़ा है. पता चलता है की नेताजी बस आ ही रहे है. यानि विमान में सवार सौ पचास लोगो के समय की कोई कीमत नहीं है. अगर उन्हें आगे कोई फ्लाईट लेनी है और वो लेट हो रहे है तो बस प्रार्थना करे की आगे वाली फ्लाईट भी लेट हो जाए क्योंकि नेताजी का सवाल है. हाल ही में तो संसद ने नेता और उसके परिवार को मुफ्त यात्रा का प्रावधान भी कर दिया है, जैसे की हवाई जहाज न होकर उनके बाप का कोई ख़रीदा हुआ बंधुआ मजदूर है . फिर ऐसे में अगर एयर इंडिया ५५०० करोड़ के घाटे में चलती है तो क्या आश्चर्य है.

दृश्य चार :
गुडगाँव से दिल्ली में प्रवेश करने वाला टोल टैक्स. आधे घंटे की लाइन में गाड़ियाँ बम्पर से बम्पर लगा कर अटी पड़ी है. आम आदमी को पैसे दे कर प्रवेश करने में बीस से पच्चीस मिनिट का समय लग रहा है. लेकिन इस दौरान एक दर्जन लाल और नीली बत्ती वाली गाडिया साइरन देती हुई आती है और, शायद बिना पैसे दिए हुए (सरकारी गाड़ी होने की वजह से), आराम से निकल जाती है.

कभी कभी सोचता हूँ, कि क्या इंग्लैंड की तरह, हमारे देश के महामहिम या फिर टुच्चे छाप नेता अकेले या फिर अपने लाव-लश्कर के साथ कभी आम आदमी की तरह ट्रेन या हवाई यात्रा कर सकते है. यहाँ यह बतलाना जरुरी है की सोनिया गाँधी ने जब एक बार मवेशी या इकोनोमी क्लास में सफ़र किया था जब जहाज की तीन पंक्तिया सुरक्षा की दृष्टी से खाली रखी गई थी. फिर दिमाग में आता है की अगर इन लोगो को अगर आम आदमी के तरह सफ़र करना पड़े तो नेता बनने से क्या फायदा. हमारे देश में नेता होने का मतलब है, जनता से दूर होकर, सारे सरकारी संसाधन अपनी बपौती समझ कर उनका दुरूपयोग करना. ये नेता तो चुनावी सभा में भी हेलीकाप्टर से जाते है और फिर भाषण की ऐसी बाढ़ ले आते है की बस जीतते ही मक्खन की तरह सड़क बनवा देंगे. मुगालते में जनता वोट दे देती है. मक्खन ये खा जाते है और सड़के इनके विभाग के सरकारी अफसर. नतीजा वोही ढ़ाक के तीन पांत.

क्या इंग्लैंड की रानी को सुरक्षा की फ़िक्र नहीं है या फिर वहां पर आतंकवादी हमले नहीं करते ? अवश्य करते है और अक्सर वहां हमले करने वाले अपने नापाक इरादों को अंजाम देने से पहले ही पकड़ लिए जाते है. क्योंकि वहां पर फिर भी न्याय है, कानून है. पुलिस का काम जनता की रक्षा करना है न की हमारे देश की तरह मंत्रियो से सांठ गाँठ कर अपना उल्लू सीधा करना और आम आदमी को त्रस्त करना.

देश में आज भी राज्य का मुख्यमंत्री तक अपने काफिले में साईंरन वाली गाडिया, पुलिस और डॉक्टर की टोली तक को साथ ले कर चलता है. सोचो, डॉक्टर की जरुरत अस्पातल में भर्ती मरीज को ज्यादा है या फिर मुख्यमंत्री को अपने काफिले में अपना रुतबा दिखने के लिए. हमारे राष्ट्रपति को आम आदमी से जुड़ने की बजाये सुखोई विमान में बैठने में अधिक दिलचस्पी है. चाहे इसके लिए उन्हें कुछ दिन ट्रेनिंग ही क्यों न लेनी पड़े और इसके लिए वायु सेना के डिविजन को अन्य कामो से मुक्त क्यों न किया जाए.

कहने को इंग्लैंड में अभी भी राजशाही है पर वहां राजा तो प्रजा के साथ चल रहा है. वो रेल गाडी के समय पर आ रहा है न कि रेल को उसके समय पर चलने को बाध्य किया जा रहा है. और हमारे यहाँ प्रजातंत्र जहाँ, सिर्फ कहने भर को, प्रजा का तंत्र चलता है. अब आप किसे प्रजातंत्र कहेंगे और किसे राजशाही.

शायद अभिशप्त है इस देश के नागरिक ऐसे दोहरे चरित्र वाले प्रजातंत्र से.

हम सबने ऐसा कटु अनुभव अपनी जिन्दगी में अवश्य किया होगा. इस दोहरे चरित्र वाके प्रजातंत्र पर आपकी क्या राय है ?

ताज और कसाब

कसाब और उसके साथियो ने होटल ताज पैलेस पर हमला ऐसे ही किया था. उन्हें पता था की इस आतंकी घटना को अंजाम देने के बाद भारत देश की सरकार उनकी खातिरदारी वैसी ही करेगी जैसी की ताज महल होटल में होती है. आइये एक नज़र डाले और देखे की ताजमहल और ताज होटल मुंबई पर हमला करने वाले कसाब में क्या क्या समानताये है.

जिस प्रकार ताज महल को शाहजहाँ बनाया था ठीक उसी प्रकार कसाब को हमारे आज के हरामखोर नेताओ ने बनाया है. ताज महल को मुमताज की याद में बनाया गया है और कसाब को २६ नवम्बर २००८ की उस भयावह रात को शहीद हुए उन एक सौ अस्सी लोगो की शहादत को याद रखने के लिए जिन्दा रखा गया है.

ताज के पर्यवेक्षण में तीन मुख्य निर्माता अब्दुल करीम मामूर खान, मक्रामत खान और उस्ताद अहमद लाहौरी थे, कसाब को भी जिन्दा पकड़ने के लिए मुंबई पुलिस के तीन बहादुरों हेमंत करकरे, विजय सलास्कर और अशोक कामटे को अपनी बलि देनी पड़ी थी.

ताज के खर्चे में उस समय के करीब ३.२ करोड़ रूपये खर्च हुए थे और कसाब के ऊपर अब तक अनुमानित ३१ करोड़ रूपये खर्च हो चुके है. इसमें से ३० करोड़ से तो मंत्रियो संतरियों और बाबुओ की जेब गरम हुई होगी). जहाँ देश में आज आम आदमी दिन के ८५ रूपये नहीं कमा पाता वही सरकार आम आदमी की मेहनत की कमाई के इस पैसे के टैक्स से एक दुर्दांत वहशी दरिन्दे को जिन्दा रखने के लिए रोज ८.५ लाख रूपये खर्च कर रही है. अगर कसाब को पांच सितारा होटल में एक साल तक रखा जाता तो कुल खर्चा इस सरकारी खर्चे के लगभग दो प्रतिशत के बराबर होता. चौकिये नहीं ये कोई आश्चर्य की बात नहीं है. देश में जहाँ लोग भूख से मर रहे है, आत्महत्या कर रहे है वहां अफज़ल और कसाब जैसे जहरीले सांपो को दिल्ली न केवल दूध पिला कर पाल पोस रही है बल्कि उनको मेहमानों के जैसे मटन बिरयानी खिलाई जा रही है. इसे देख कर तो ऐसा ही लगता है की देश में गुमनाम आम नागरिक से तो आतंकवादी का वर्तमान और भविष्य कई गुना अच्छा है.

जिस तरह ताज महल को सम्पूर्ण भारत और एशिया से लाई गई सामग्री से निर्मित किया गया था ठीक उसी प्रकार मुंबई हमलो को निर्बाध रूप से क्रियान्वन करने के लिए देश के कई हिस्सों से जयचंदों ने सामग्री के रूप में होटल के नक़्शे, मोबाइल, सिम इत्यादि मुहैया करवाए थे. और पडोसी देश ने अपने और उसके मित्र देश चीन तथा अफगानिस्तान में निर्मित गोला, बारूद, बंदूके दे कर सहयोग किया था.

ताज महल को बनाते वक़्त निर्माण सामग्री के परिवहन के लिए एक हज़ार हाथियों का इस्तेमाल किया गया था. देश पर हुए इस हमले से निपटने के लिए भी हज़ार कमांडो और अर्ध सैनिक बलों का इस्तेमाल किया गया.

ताज महल के निर्माण में बीस हज़ार मजदुर लगे थे और करीब इतने ही पुलिस वाले मुंबई की सडको पर हमले के बाद दिखाई दिए थे.

जिस प्रकार ताजमहल इमारत समूह रक्षा दीवारों से परिबद्ध है, ठीक उसी प्रकार सरकार ने आर्थर रोड जेल को भी तथाकथित रूप से आमूलचूल सुरक्षा से परिपद्ध कर दिया है. (तथाकथित सुरक्षा इसलिए क्योंकि सरकार के अलावा किसी को इस बात का भरोसा नहीं है की वहां कोई आतंकवादी नहीं जा सकता, अब तक अगर कोई आतंकवादी वहां नहीं गया तो इसलिए नहीं क्योंकि सुरक्षा अभेद है बल्कि शायद इसलिए की पडोसी मुल्क में बैठे कसाब के कई बापों में से अब वो किसी के काम का नहीं रहा और उन बापों में से किसी को भी अब उसकी कोई जरुरत नहीं होगी.)

हम लोग अपनी आँख बंद कर, दुनिया को अँधा समझ लेते है. कब तक हम प्रजातंत्र के नाम पर नपुंसक बने बैठे रहेंगे. क्यों हम अन्य देशो से नहीं सीखते. चीन को देखो वो इतनी प्रगति क्यों कर रहा है. इसका ये वाकया एक सीधा सा उदाहरण है. 'सान्लू' जो पिछले साल सितम्बर तक चीन की सबसे बड़ी पाउडर दूध विक्रेता कम्पनी थी उसने मिलावटी दूध पाउडर बेचा जिससे छ चीन में बच्चो की मृत्यु हो गई. घटना मीडिया में आते ही कंपनी पर इतने केस हुए की उस कंपनी का दिवाला निकल गया. और इस घटना के एक साल के बाद इस साल नवम्बर में चीन की अदालत ने आम लोगों की सुरक्षा को ख़तरे में डालने और मेलेमाइन से विषाक्त पाउडर दूध सप्लाई करने के आरोप में दो लोगों को मृत्यु दंड दिया और १९ अन्य लोगों को जेल की सज़ाएं दी. उधर छ बच्चो को मिलावटी दूध बेच कर मारने वालो को फांसी हो गई है और इधर हम दो सौ लोगो को निर्ममता से मौत के घाट उतारने वाले और कई हजारो को हताहत करे वाले वहशी दरिन्दे को मेहमान बनाये रख प्रजातंत्र की लाश पर सेक कर रोटियां और अपनी बोटियाँ खिला रहे है. जब तक देश की बागडोर ऐय्याश और भ्रष्ट नेताओ के हाथो में रहेगा तब तक कोड़ा सरीखे नेता हजारो करोड़ खाते रहेंगे और डकार भी नहीं लेंगे. देश में लाल किले पर हमला, कंधार काण्ड, अक्षरधाम हमला, समझौता बम ब्लास्ट, मुंबई ब्लास्ट, मुंबई ट्रेन हमले, जयपुर, वाराणसी बम ब्लास्ट होते रहेंगे और लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे. मुंबई में हर बड़े हमले के बाद अगले दिन लोग घर से अपनी रोजी रोटी के लिए निकलते है और हमारे अभिनेता और नेता प्रजाति के लोग इसे मुंबई की जीवट शैली (स्पिरिट ऑफ़ मुंबई) कह कर बड़ी बेशर्मी से अपना पल्ला झाड लेते है. क्या ये मुंबई की स्पिरिट है या फिर मुंबईवासियों की मज़बूरी की हर रोज सर पर मंडराता हुआ खतरा देखते हुए भी पेट की खातिर उन्हें मजबूर हो घर से बहार निकलना पड़ता है ये जानते हुए भी की उनका शहर विकसित देशो के अन्य बड़े शहरो के मुकाबले कई गुना ज्यादा असुरक्षित है. हमारी इस नाकामी पर इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है की बस... जय हो !!!

हमारा असली दुश्मन कौन है

अगर देश में ये प्रश्न पूछा जाए कि "आप किसे देश का असली दुश्मन समझते है" तो ज्यादातर लोगो का उत्तर होगा, पाकिस्तान, देश के नेता, कसाब, अफजल. लेकिन क्या ये असली दुश्मन है. ये जानने से पहले २४ नवम्बर से लेकर एक पखवाड़े तक देश में हाल में और पूर्व में हुई मुख्य दुर्घटनाओं पर एक नज़र डाले. जिन घटनाओं ने देश को हिला कर रख दिया और आजकल हम उस दिन मोमबत्ती जला कर अपनी संवेदनाएं प्रकट कर अपने कर्तव्य से इतिश्री कर लेते है.

पिछले हफ्ते २६/११ को, "राष्ट्रीय शर्म दिवस पर", देश पर हुए आंतकी हमलो को एक साल पूरा हो गया. कुछ लोगो ने मोमबत्ती जला कर पिछले साल इसी दिन आतंकवाद के भेंट चढ़े शहीदों को याद किया, कुछ नेता सरीखे लोगो ने वोट के लिए जनता के बीच जा कर के अपने तथाकथित दुःख के ड्रामे का इजहार किया. देश में कुछ लोगो ने इस समय इस घटना को याद किया, कुछ ने शिल्पा शेट्टी की शादी की बारीकियों को चस्के ले कर पढ़ा तो कुछ ने मीडिया में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की सुखोई में बैठ कर उड़ान भरने को इतिहास रचने की संज्ञा को तवज्जू दी. कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने उस दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के राजकीय अतिथि सत्कार और रात्रि भोज पर देख कर गुस्सा किया.
देश में कही नम आँखों में श्रद्धांजलि थी, कही मौन शोक संवेदनाएं तो कही क्षोभ कि क्यों अब तक कसाब को देश का मेहमान बना कर उसकी मिजाजपुर्सी की जा रही है. देश का नागरिक आज भी अच्छी तरह से जानता है कि देश में फ़ोर्स वन बन जाने से देश का नागरिक कोई विशेष सुरक्षित नहीं हुआ है. फ़ोर्स वन उन खामियों को शायद कुछ हद तक कम कर सके जो चुक २६/११ के हमले में आतंकियों से लोहा लेते समय हमारे सुरक्षा बलों से हुई थी. शायद इनके पास स्वचालित हथियार भी हो (वो बात अलग है कि जरुरत के वक़्त वे हथियार चलने लायक पाए जाते है या नहीं). लेकिन तब तक आतंकवादी अब इनसे एक कदम और आगे बढ़ चुके होंगे. ये चूहे बिल्ली का खेल यूँ ही चलता रहेगा. आम आदमी की बलि चढ़ेगी और नेता लोग सुरक्षा के नाम पर दोनों हाथो से लुटते हुए, अनाप शनाप पैसा बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे.

२६/११ की बरसी के ठीक एक दिन पहले, 17 वर्षों की जाँच और 48 बार अवधि बढ़ने के बाद अंतत , ये लिब्रहान नाम का एक भुत, जिन्न की तरह बोतल से बहार निकल कर आ गया. लिब्राहन के इस भुत के बहार आने के समय पर कई अटकले लगाईं जा रही है. जब यह रिपोर्ट आई तब बिखरे हुए विपक्ष ने गन्ना किसानों के मामले में गज़ब का समन्वय दिखा रहे था और सभी दल एक स्वर में बोल रहे थे. मधु कोड़ा के भ्रष्टाचार का मामला झारखंड चुनावों के बीच छाया था, साथ ही स्पेक्ट्रम घोटाला भी केंद्र का सिरदर्द बना हुआ था. चूँकि ये रिपोर्ट जून में जस्टिस लिबरहान ने सरकार को सौंपी थी. फिर सरकार ने ये रिपोर्ट पिछले सत्र में क्यों पेश नहीं की. नवम्बर के सत्र के शुरु होते ही इसे क्यों नहीं पेश किया गया. ये सवाल बेशक सोचने पर मजबूर कर देते है. इस रिपोर्ट में भी कई रहस्यमय बाते भी है. उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अतुल गुप्ता ने हाई कोर्ट में हलफ़नामा देकर कहा था कि अयोध्या विवाद से जुडी 23 फा़इलें गृह विभाग के एक विशेष कार्याधिकारी सुभाष भान साध के पास थीं जिनकी मृत्यु हो चुकी है और ये फाइले गुम हो गई है. खोजबीन करने पर से पता चलता है कि सुभाष भान साध की मृत्यु 30 अप्रैल 2000 को दिल्ली में जिस कथित रेल दुर्घटना में हुई थी उस पर उनके परिवार ने संदेह ज़ाहिर करते हुए सुनियोजित हत्या का आरोप लगाया था. सुभाष ने अस्पताल में अपने रिश्तेदारों को बताया था कि उसे दिल्ली स्थित तिलक ब्रिज स्टेशन के पास चलती ट्रेन से धक्का दिया गया था. हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को पूरे मामले की जांच के आदेश दिए थे. लेकिन अभी तक दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट नही आई है. दूसरी और जहाँ रिपोर्ट में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दोषी ठहराया गया है वही कमीशन के अधिकारियो का कहना है कि वाजपेयी को कभी भी कमीशन ने पूछताछ के लिए तलब ही नहीं किया फिर उन्हें दोषी कैसे ठहराया जा सकता है.
अभी आम आदमी इन उलझी हुई गुत्थियों के बारे में कुछ सोचे इससे पहले २/३ दिसम्बर की वो भयावह रात आ गई जिसे आप और हम भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जानते है. आज से पच्चीस साल पहले सन १९८४ में, दिसंबर की उस सर्द आधी रात में बेख़बर सो रहे भोपाल के बेगुनाह और मासूम लोगों को, कार्बाइड का ज़हर जिसे मिथाइल आइसोसाइनेट भी कहते है ने इंसानों को कीट-पतंगों की तरह मारकर, हजारो हँसते खेलते व्यक्तियों को लील लिया था. भोपाल गैस दुर्घटना में मरने वालों की संख्या 25 वर्षों में बढ़कर न जाने कितनी हो गई है. मगर 25 साल में कही कोई इंसाफ़ नहीं हो पाया है और अब तक एक भी गुनहगार को सज़ा नहीं हुई है.
भोपाल के वरिष्ट पत्रकार श्री राजकुमार केसवानी जी ने, इस दुर्घटना के करीब तीन साल पहले, नौ महीने की जी-तोड़ कोशिशों के बाद ये पाया था कि कार्बाइड का वह कारखाना एक बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह चल रहा था. सुरक्षा के सारे नियमों की धज्जियां उड़ाता हुआ. १९ सितंबर, १९८२ को उन्होंने अपने साप्ताहिक अख़बार ‘रपट’ में लिखा ‘बचाइए हुज़ूर, इस शहर को बचाइए’. एक अक्तूबर को फिर लिखा ‘भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने पर’. आठ अक्तूबर तो चेतावनी दी ‘न समझोगे तो आख़िर मिट ही जाओगे.’ जब देखा कोई इस संभावना को गंभीरता से नहीं ले रहा तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को पत्र लिखा और सर्वोच्च न्यायालय से भी दख़ल देकर लोगों की जान बचाने का आग्रह किया. देश में आज तक आम आदमी के लिए कुछ हुआ है जो अब होता. नतीजा वही ढाक के तीन पात. अफ़सोस न कुछ होना था, और न ही कुछ. हाँ, हुआ तो बस इतना कि विधानसभा में सरकार ने इस ख़तरे को ही झुठला दिया और कार्बाइड को बेहतरीन सुरक्षा व्यवस्था वाला कारखाना क़रार दिया. उन्होंने फिर हिम्मत जुटाई और 16 जून, 1984 को देश के प्रमुख हिन्दी अख़बार ‘जनसत्ता’ में फिर यही मुद्दा उठाया. एक बार फिर सेइसकी अनदेखी हुई.

अभी भोपाल गैस त्रासदी को शायद दो तीन दिन लोग याद रखेंगे तब तक "बाबरी मस्जिद" को ढहाने के पंद्रह साल पुरे हो जायेंगे. उसके पीछे पीछे ११ दिसम्बर को संसद पर हुए हमले की बरसी आजाएगी.

तो कुल मिला कर सोचने वाली बात ये है कि असल में देश में आम आदमी का दुश्मन कौन है. क्या वो दुश्मन पाकिस्तान है, कसाब है, यूनियन कार्बाइड है, नेता है, हरामखोर सरकारी अफसर और बाबु है, समाज है, (अ)न्याय पालिका या (अ)न्याय की कुर्सी पर मरे हुए एक मूर्ति की तरह बैठे हुए ये तथाकथित न्यायमूर्ति है. आखिर हमारा असली दुश्मन है तो है कौन. मेरा मानना है कि ये उपरोक्त सब तो केवल कारण है जो हमारी उदासीनता का फायदा उठा कर हमारा इस्तेमाल कर रहे है. हमारा असली दुश्मन और कोई नहीं बल्कि हमारी अपनी अनुरागहीनता (उदासीनता) है

देश में कही भी कोई भी आदमी अपना काम निकलवाने के लिए रिश्वत देने में संकोच नहीं करता. अभी भी सन १८०० के कानून और १९५० के समय से चल रही फाइलों में रिकॉर्ड रखे जाते है हेराफेरी आसानी से हो सके. आम जनता बैठ कर तमाशा देखती है.आज पढ़ा लिखा आदमी वोट देने नहीं जाता क्योंकि वो इतना त्रस्त हो चूका है कि उसे लगता है कुछ बदलने वाला नहीं. वो चुनाव के दिन को छुट्टी का दिन मान कर वोट देने के बजाये पिकनिक जाना या घर पर आराम करना पसंद करता है. वोट देने वाले अक्सर वोट बैंक होते है जिनको आसानी से नोट या जात पांत का लालच दे कर ख़रीदा जा सकता है. ये ही कारण है की आज राजनीति में गुंडे मवाली आ गए है और जब गंजो के सर नाख़ून उग आये तो फिर तो "भारत भाग्य विधाता" के अलावा और कुछ गाया भी नहीं जा सकता है. उदासीनता के हालत ये है कि आदमी अपनी और अपने परिवार का पेट भरने के अलावा और कुछ न सोचता है और न ही सोचना चाहता है. वो ये मानने को तैयार नहीं है की अगर एक अच्छे समाज की नीव रख दी जायेगी तो उसकी और उसके आने वाली पीढ़ी की कई मुसीबते स्वत ही ख़त्म होजाएँगी.

भ्रष्टाचार और हम

जुलाई से सितंबर २००९ (2009) यानि वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ७.९ (7.9) प्रतिशत की दर से बढ़ी. ये दर अब तक घोषित ६.३ (6.3) प्रतिशत सालाना वृद्धि के अनुमान से कहीं ज़्यादा है. सरकार के मुताबिक ये ग़ौरतलब है कि ये वृद्धि दर पिछले चार दशकों के सबसे ख़राब मॉनसून और कमज़ोर कृषि क्षेत्र के बावजूद है. यहाँ कितनी आसानी से सरकार ने बाहरी कारणों को तो गिना दिया पर ये बतलाना भूल गए की, अगर आम आदमी एक बार के लिए केंद्रीय बैंक की ब्याज दर आदि जटिल वाणिज्यिक पैमानों को भूल भी जाए तो ये कैसे भूल सकता है की इस ७.९ प्रतिशत पर बढ़ रही अर्थव्यवस्था में उसका पसीने का योगदान शामिल है. और अगर देश में कोढ़ की तरह व्याप्त भ्रष्टाचार को निकाल दे तो ये दर कहाँ से कहाँ पहुंच सकती है.

देश की अर्थव्यवस्था ७.९ (7.9) प्रतिशत की दर से बड़ी है तो केवल देश वासियों का और आम आदमी के योगदान के कारण. ये तरक्की वोट बैंक या जात पांत के नाम पर बरगला कर वोट लुटने वाले लुटेरो के बूते पर कतई नहीं हुई है. उन सब ने तो देश को जो चुना लगाया है उनको देख और सुन कर इन्सान तो क्या अगर भगवान् भी कही हो तो रो पड़ेगा.

आउटलुक पत्रिका में छपे एक लेख के अनुसार देश में १९९२ से अब तक देश में ७३ (73) लाख करोड़ रूपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए है. ये धांधली का पैसा हमारे देश के ५३ (53) लाख करोड़ के सकल घरेलु उत्पाद से २७% (27%) ज्यादा है. भ्रष्टाचार के प्रति हम लगभग पूर्ण रूप से उदासीन है और देश ने आज इस कैंसर रूपी रोग के साथ रहना अपनी नियति मान लिया है. लेकिन अगर इस पैसे का सही जगह उपयोग होता तो शायद देश की तस्वीर ही कुछ और होती. क्या आप जानते है भ्रष्टाचार के इतने पैसे से :

देश में तीस लाख रूपये के लागत से २.४ (2.4) करोड़ प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोले जा सकते थे. यानि देश के हर गाँव में ३ चिकित्सा केंद्र.

पांच लाख रूपये प्रत्येक की लागत से १४.६ (14.6) करोड़ निम्न / मध्य वर्गीय मकान बन सकते थे.

३.०२ (3.02) करोड़ रुपयों की लागत से २४.१ (24.1) केंद्रीय विद्यालय बन सकते थे जिसमे प्रत्येक में कक्षा छ से बारह तक के दो खंड या सेक्शन हो सकते थे.

सम्पूर्ण भारत देश के परिधि को ९७ (97) बार चक्कर काटते हुए १४.६ (14.6) लाख किलोमीटर की सड़क बन सकती थी.

हर साल १,२०० (1,200) करोड़ रूपये व्यय करके, देश की पचास प्रमुख नदियों की अगके १२१ (121) सालो तक सफाई हो सकती थी.

२,७०० (2,700) करोड़ रूपये के लागत से ६०० (600) मेगा वाट के २,७०३ (2,703) कोयले के पॉवर प्लांट लग सकते थे.

८१,१११ (81,111) करोड़ रूपये खर्च करके, ९० (90) नारेगा जैसी योजनाये चलाई जा सकती थी.

६०,००० (60,000) करोड़ रूपये खर्च करके, देश के सारे किसानो के ऋण १२१ (121) बार माफ़ किये जा सकते थे.

देश के प्रत्येक नागरिक को करीब ५६,००० (56,000) रूपये दिए जा सकते थे. या या फिर गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक लाख अस्सी हज़ार रूपये दिए जा सकते थे.

७० (70) करोड़ लोगो को ७० (70) करोड़ नैनो दी जा सकती थी या २८० (280) करोड़ लैपटॉप बांटे जा सकते थे.


झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को प्रवर्तन निदेशालय, सतर्कता विभाग और आय कर विभाग के संयुक्त दल का कोड़ा चल चूका है. १९९० (1990) में एक खदान मजदूर रहे इस आदमी ने जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार किया है उसे देखते हुए तो इसे देशद्रोही करार देना चाहिए और देशद्रोहियों को मिलने वाली सजा से भी बदतर अगर कोई सजा हो तो वो इसे मिलनी चाहिए. पर अगर गौर से देखा और सोचा जाए तो ये तो देश में व्यप्त भर्ष्टाचार के समुद्र की एक छोटी सी मछली है. इस मछली के पकड़ में आने का एक कारण ये है की इसे देश की बड़ी या छोटी, राष्ट्रीय या प्रादेशिक पार्टी का वरद हस्त नहीं प्राप्त है. इसके समक्ष और इससे कई बड़ी बड़ी मछलियाँ कृषि मंत्री, क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष, पूर्व रेल मंत्री, पूर्व रक्षा मंत्री, आन्ध्र प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों के पूर्व मुख्यमंत्री या उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन कर देश के कई हज़ार करोड़ रूपये डकार चुकी है. ये इन्सान के भेष में कुछ ऐसे आदमखोर है जिनका आम जनता से लेकर सत्ता के गलियारों में सबको पता है, नहीं पता है तो बस केवल कानून को. कानून अपनी आँख पर काली पट्टी बांध कर के अँधा होने का नाटक कर रहा है और ये काले कारनामे कर के देश को गर्त में धकेल रहे है.

खदान मजदुर से लेकर सत्ता के शिखर पर और अब सलाखों तक का सफ़र के दरमयान २००३ से २००६ तक झारखण्ड का खनन मंत्री और राज्य की खनन सम्पदा का नियंत्रक मधु कोड़ा पर दो हज़ार करोड़ से अधिक की सम्पति बनाने का आरोप है. मधु के नजदीकी मनोज पुनमिया ने मुंबई स्थित बालाजी बुलीयों बाज़ार नाम की कंपनी के यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया खातो में २००८ और २००९ में करीब एक हज़ार करोड़ रूपये जमा करवाए जिसमे से पांच सौ करोड़ रूपये नकद जमा करवाए गए. देखा जाए तो कोड़ा के अवैध दो हज़ार करोड़ रूपये तो कोई बड़ी बात होनी ही नहीं बात चाहिए, क्योंकि झारखण्ड की खानों में सालाना आठ हज़ार करोड़ रुपयों का अवैध खनन होता है.

वैसे जब खुद को बांटने की बात आती है तो हम इन नेताओ के आदेश अनुसार खुद को उत्तर, दक्षिण भारतीय, मराठी, राजस्थानी, गुजरती आदि आदि मान लेते है है पर देश के नेता बंटते नहीं ये सब एक जैसे ही हरामखोर है. खनन से देश का हनन करने में अगर मधु कोड़ा उत्तर में है तो दक्षिण के आंध्र प्रदेश के खदान मालिक और राज्य पर्यटन मंत्री जनार्धन रेड्डी और गाली रेड्डी इससे एक कदम आगे ही है. हाल ही में आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए उनकी तीन खदानों से कच्चे लोहे के खनन पर रोक लगा दी है. ये खदानें आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले में स्थित हैं जो कि कर्नाटक के बेल्लारी ज़िले से सटा हुआ है. वैसे तो इन पर अवैध खनन कर के सरकारी खजाने को कई सौ करोड़ रुपए का चूना लगाने के आरोप काफी समय से लग रहे हैं लेकिन अब तक इन आरोपों के आधार पर सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की. सरकार की खामोशी का रहस्य यह था की राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी, जनार्धन रेड्डी के करीबी मित्र थे और और मुख्यमंत्री के परिवार के व्यापारिक हित भी इनकी कई कंपनियों से जुड़े हुए है.

ये रेड्डी बंधुओ ने आंध्र प्रदेश के कडापा जिले के जमालादुगु मंडल में ६,८५० (6,850) करोड़ (छ हज़ार आठ सौ पचास करोड़) रूपये की लागत से स्टील प्लांट बना रहे है. खास बात ये है की इस परियोजना पर अब तक करीब १,५०० (1,500) करोड़, (एक हज़ार पांच सौ करोड़) रूपये खर्च हो चुके है लेकिन न तो रेड्डी बंधुओ ने कोई बैंक से लोन लिया है और न ही इस परियोजना का बाज़ार में अब तक कोई पब्लिक इश्यु आया है. सही मायनों में ये काले पैसे को सफ़ेद करने की कवायद हो रही है.

एक कहावत है, यथा राजा तथा प्रजा. ठीक उसी तर्ज पर, नेता तो नेता सरकारी अफसर, बाबु जिसे जहाँ मौका मिलता है देश को चुना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. हाल ही में दिल्ली सरकार ने अपने कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए बायोमिट्रिक प्रणाली लागू की. इस प्रणाली के लागु होते ही पता चला की सरकार ऐसे २२,८५३ (22,853) कर्मचारियों को तनख़्वाह दे रही है जिनका वजूद ही नहीं है. दिल्ली के मेयर कंवर सेन के अनुसार इन काल्पनिक कर्मचारियों की तनख़्वाह कुल मिलाकर सरकार को दो सौ करोड़ रूपये से ज्यादा चुना लगाया जा रहा था. कहा जा रहा है की अब मामले की जांच चल रही है और जैसा की हमेशा होता आया है ये अंतहीन जांच बिना किसी परिणाम के सदैव चलती ही रहेगी.

देश में एक आम आदमी (या आजकल महानगरो के परिवार में दम्पति) क्या केवल इसलिए मेहनत करते है की इस मेहनत की मलाई नेता लोग खाए, भ्रष्टाचार में उड़ायें और उस मेहनतकश व्यक्ति को केवल खुरचन खा कर के जिन्दा रहना पड़े. इतनी हाड तोड़ मेहनत करने के बाद भी उसे बुनियादी जरुरत पूरी हो बस इतनी ही जिन्दगी मिले और हरामखोर लोग उस आम आदमी का पांच साल में एक बार हाथ जोड़ कर उससे उसका वोट ले कर गुलछर्रे उडाये.

अगर दुसरे नजरिये से देखा जाए तो शायद हम खुद ही इसके जिम्मेवार है. आज आम आदमी अपनी जिन्दगी में इतना उलझ गया है, वो अपनी जरूरतों को पूरा करने में इतना तल्लीन हो गया है की वो समाज, संसार और भविष्य के प्रति उदासीन हो गया है. उसे अपना भविष्य अपने बच्चो के भविष्य की चिंता है लेकिन वो ये नहीं सोचता की अगर उसके आस पास का गन्दा भ्रष्ट माहौल उसकी अंतरात्मा और उसके परिवार पर कितना असर डाल रहा है. यदि वो केवल अपने परिवार के भविष्य की बात छोड़ कर माहौल बदलने की तरफ प्रत्यन करे तो शायद देश का भविष्य कुछ और ही होगा.

नेताओं की सादगी या सादगी का ड्रामा

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने जहाँ चुनावों में आम आदमी की बात उठाई थी, वहीं अब सरकार ने मंत्रियों और सांसदों को अपने रोज़मर्रा के जीवन में सादगी अपनाने का संदेश दिया है.

हाल में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिल्ली से मुंबई जाते समय ‘बिज़नेस क्लास’ की जगह ‘इकोनोमी क्लास’ से हवाई यात्रा की थी. ये अलग बात है कि उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उनके आसपास की कई सीटें सुरक्षाकर्मियों के हवाले कर दी गईं. कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने दिल्ली से लुधियाना और फिर वापसी का सफ़र शताब्दी ट्रेन से तय किया. उनके रेल कोच में भी कई सीटें सुरक्षा की दृष्टि से या खाली रहीं या फिर सुरक्षाकर्मियों के हवाले कर दी गईं. ज्ञातव्य रहे की ये वो ही राहुल गाँधी है जो अपने प्रधानमंत्री पिता के समय अगर तालकटोरा स्टेडियम में तैरने जाते थे तो पूरा स्टेडियम खाली करवा दिया जाता था.

वैसे ये सादगी दिखने का प्रयास तो नेक है लेकिन सोचने की बात ये है की ये आज के ऐय्याश और हरामखोर नेताओ की नस्ल के बीच ये कितने दिन चलेगा और जब तक चलेगा तब तक कुछ हद तक ये आम जनता को ज्यादा हैरान और परेशान ही करेगा. कुछ हद तक इसके लिए जिम्मेदार हमारी मानसिकता है, जिसमे आज इन दो कौडी के टुच्चे कार्टून नेताओ को सर पर चढा रखा है. इन लोगो को जिनकी काबिलियत बस इतनी ही है की ये जात पाँत के नाम पर डरा धमका कर, लुट खसोट कर और दंगा करवा कर वोट लेना जानते है, को आज इतनी इज्जत दी जाती है की एक बार तो शायद भगवान् को भी शर्म आ जाये. अरे इतनी इज्जत तो अंग्रेजो के ज़माने में अंग्रेजो को भी नहीं मिलती होगी. गंजो के सर नाखून की बदौलत आज कोई कार्टून लल्लू पूर्व मुख्यमंत्री और तथाकथित रूप से (अ) भूत पूर्व रेलमंत्री करोडो का चारा और कुछ लोगो को खा कर डकार भी नहीं ले रहा है, तो किसी की माया करोडो रूपये की
मूर्तियाँ बनवा कर जनता के मेहनत के पैसो का खुल्म्खुला दुरूपयोग कर खुद का खुद ही महिमा मंडन करने में लगी है.

सबसे पहले मेरा प्रश्न ये है की जब ये गरीबो का देश बोला जाता है तो नेताओ को, जो जनता की मेहनत से कमाए हुए सरकारी टैक्स के पैसे पर पलते है उनको, इतनी अमीरी में रहने का हक किसने दिया. कानून बना देना चाहिए की नेताओ की तनख्वाह देश के प्रति व्यक्ति आय से ज्यादा नहीं होगी, नेताओ को अगर अपनी सुरक्षा चाहिए तो खुद अपने खर्चे पर इंतजाम करना पड़ेगा, आम आदमी की तरह ही उनको रेल, बस और सड़क यात्रा करनी पड़ेगी और अपनी हर आमदनी और खर्चे का ब्यौरा देना पड़ेगा नहीं तो वे चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दे दिए जायेंगे. उनकी गाडियों से लाल और नीली बत्ती निकाल ली जायेगी ताकि वो आम जनता से जुड़ सके और उन्हें हर जगह साइड से नहीं निकाल कर लाइन में लग कर अपनी बारी आने का इंतज़ार करना पड़ेगा. लेकिन अगर ऐसा करेगा कौन, क्योंकि खादी पहन कर ये तो खुद कानून बनाते है (और फिर बाद में उसी कानून को तोड़ते भी ये ही लोग है)

सुना है सोनिया गाँधी की सुरक्षा के लिहाज से हवाई जहाज की इकोनोमी क्लास में पांच पंक्तिया बुक कर दी गई थी जिसके के टिकट में पचपन हज़ार रूपये खर्च हुए. उसके ऊपर एक अलग जहाज में तीन बुलेट प्रूफ़ SUV (अति विशिष्ट व्यक्तियों की कार) गई थी, जो की निजी विमान पर होने वाले बासठ हज़ार के खर्चे से ज्यादा ही बैठता है. इस लिहाज से ये जनता की भावनाओ के साथ हमदर्दी जताने का पब्लिसिटी स्टंट लग रहा है.

सत्ता के गलियारों में बैठे हुए नमूनों का एक और तमाशा

कल से ही देश की राजनीती में उबाल आया हुआ है। देश की राजनीति का विभत्स्य रंगमंच कहे जाने वाले प्रदेश यानि, उत्तर प्रदेश में कल से ही एक नए नाटक का विमोचन हो रहा है जिसके मुख्य पात्र है हज़ार करोड़ से ज्यादा समाप्ति की मालकिन, एक अनुसूचित दलित की बेटी जिसके पास आम आदमी तो क्या उसकी पार्टी के नेताओ तक का पहुंचना नामुमकिन है और जिसकी सुरक्षा में दो दर्ज़न देश के उत्कृष्ट कमांडो लगे रहते है. तो एक तरफ ये दलित की अरबपति बेटी, उसके हजारो गुंडे (इसको सरकारी तंत्र, सरकारी कर्मचारी और पार्टी के कार्यकर्ता पढ़े) और दूसरी तरफ है नपुसंक राष्ट्र की सत्ता की बागडौर सँभालने वाली कांग्रेस पार्टी. जिसकी सत्ता की रगों में आज भी उस महात्मा गाँधी का खून दौड़ता है कि अगर कोई एक गाल पर थप्पड़ मार दे तो दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए. दरअसल एक वाक्य में कहा जाए तो ये गुंडों और नापुसंको के बीच का विवाद है. वैसे तो इन दौ कोडी के लोगो पर कुछ लिख कर अपना कीमती समय ख़राब करने का मन नहीं होता पर क्या करू इतना हल्कापन देख कर खून खौल उठता है और देश के इस अफसोसजनक हालत पर शायद आज एक आम आदमी इसी तरह अपने क्षोभ की अनुभूति कर सकता है. .

अब जरा देश के मीडिया पर भी एक नज़र. हमारा मीडिया देश के कर्मठ नौजवान और कमांडो को मरवाने की चिंता किये बिना ही मुंबई हमलो का सीधा प्रसारण दिखा कर अपनी टीआरपी बढाने में शान समझता रहा. इस घटना ने सरकार की लाशो की गिनती बढ़वाने में काफी मदद की (होश उडाने वाला विडियो नीचे के मुंबई हमले से सम्बंधित पोस्ट में अवश्य देखे). आज ये सेकुलर मीडिया ये बतलाने में संकोच कर रहा है कि ऐसा भी डा. रीता बहुगुणा जोशी ने क्या कह दिया. बलात्कार की खबर को चटखारे ले कर छापने वाला मीडिया इसके बारे में दिए गए बयान को लिखने में संकोच कर रहा है.

ऐसा सुनने में रहा है की रीता बहुगुणा ने रीता जोशी ने राज्य में बलात्कार की शिकार बनी महिलाओं को राज्य सरकार की ओर से मुआवज़ा दिए जाने पर एतराज़ जताते हुए हाल में अपने भाषण में इस बात का उल्लेख किया था कि जब किसी दलित महिला के साथ बलात्कार होता है तो पुलिस महानिदेशक बिक्रम सिंह मुरादाबाद, मथुरा और दूसरे जिलों में हेलीकॉप्टर से जाते हैं और 25 हज़ार रूपए का मुआवज़ा देते हैं जबकि उनके हेलीकॉप्टर पर सात लाख का खर्च आता है. आगे रीता ने ऐसा कहाँ बतलाते है कि "हो जाए तेरा (मायावती का) बलात्कार, हम देंगे 1 करोड" -- यही वो कथन है जिस पर बबाल हो रहा है. इसमें कोई दो मत नहीं की ये टिपण्णी सरासर गलत है, और शायद रीता ने इसके लिए माफ़ी भी मांग ली बतलाते है, लेकिन क्या ये टिपण्णी औरैया में इंजीनियर मनोज कुमार गुप्ता की उनके घर में घुस का बेरहमी से बहुजन समाज पार्टी के विधायक शेखर तिवारी द्वारा करंट लगा कर और पीट-पीटकर कथित हत्या से भी घिनौनी है. रीता ने टिपण्णी की और मायावती के लोगो ने मायावती के जन्मदिन पर हर साल आर्थिक सहयोग दिवस के नाम पर खुल कर कर रही लुट और हत्या का कोई हिसाब नहीं.

मेरे विचार से जब देश में चारा खाने वाले, हत्या, बलात्कार, आतंकवाद करने वाले लोग न केवल खुले घूम रहे है बल्कि सम्पूर्ण सुरक्षा के साथ संसंद के गलियारों में बैठे है, तो फिर इस कथन को कहने वाले को न्यायिक हिरासत में लेना कही से भी न्यायसंगत नहीं लगता. अदालत भी अपने आप में एक नमूना है. हजारो करोड़ की अपनी खुद की मूर्तियाँ जो मायावती लगवा रही है सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए, उस पर रोक तक लगाने से मना कर दिया है. इससे पहले एक राज्यपाल मायावती के खिलाफ CBI जांच की इजाजत देने से भी इनकार कर चुके है.

यानि अन्य महिलाओं (चाहे वो दलित हो, नाबालिग हो या कोई भी स्त्री हो) उस राज्य में अगर उस पर कोई अत्याचार हो जाए तो सरकार सात लाख रूपये के उड़नखटोले में बैठ कर उसे पच्चीस हज़ार रूपये दे कर अपने कर्तव्य से इतिश्री कर लेती है. लेकिन ऐसा अगर कोई मुख्यमंत्री के बारे में सोच या बोल दे तो उसकी खैर नहीं.

उसके ऊपर मायावती ने रीता जोशी मामले पर एक संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस के सदस्यों को खुल्मखुल्ला धमकाया है और कहा है कि रीता जोशी का अपराध माफ़ करने योग्य नहीं है. उनका कहना था, "वरुण गाधी की तरह रीता को भी कुछ समय के लिए चाहे ज़मानत मिल जाए लेकिन इससे इस महिला का अपराध कम नहीं होता.देर सवेर क़ानून के तहत उसे सज़ा ज़रूर मिलेगी. मैं कांग्रेस के लोगों को चेतावनी देना चाहती हूँ कि कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष के किए कृत्य को दबाने के लिए क़ानून को अपने हाथ में न लें, नहीं तो उनसे सख़्ती से निपटा जाएगा."

प्रदेश में गुंडागर्दी अपने चरम पर है, सरकारी तंत्र मुख्यमंत्री चाहे वो कोई भी हो, उसके तलुवे चाटता हुआ अपना उल्लू सीधा करने में लगा है. हम चाहे देश की प्रगति की जितनी भी बाते कर ले, जमीनी हकीक़त ये ही है की देश आज भी राजा, प्रजा और गुलाम प्रथा में ही चल रहा है. फर्क इतना है की आज राजा गुंडे, मवाली अपनी जांत और बाहुबल के कारण बनते है. पहले कहते थे यथा राजा तथा प्रजा पर आज शायद लगता है यथा प्रजा तथा राजा. तो ये प्रजा जिस तरह की है या जिस तरह की प्रजा वोट देने जाती है वैसी ही सरकार बनती है और वैसा ही राज्य होता है

आज राजनीती में जिस तरह के लोग आ गए है उनसे तो उम्मींद करना बिल्ली से दूध की रखवाली करवाने के समान ही है। आइये दुआ करे की देश की डोर कुशल और योग्य लोगो के हाथ में आये जो देश की सही दशा और दिशा का निर्धारण कर सके ताकि ये बलात्कार की सियासत बंद हो और जो पीड़ित है उन्हें जल्द से जल्द न्याय मिले.

केंद्र सरकार के सकारात्मक निर्णय

देश को आजाद हुए आज साठ से भी ज्यादा साल हो चुके है और इन साठ सालो के सरकार के रिपोर्ट कार्ड में जमीनी तौर पर तरक्की के नाम पर इक्का दुक्का ही कार्य देखने को मिलता है. हमारे देश के तत्कालीन भाग्य निर्माताओ ने जो देश की जो खोखली बुनियाद रखी थी उसे समय की दीमक कब की चाट गई है. परिवर्तन संसार का नियम है पर हमारे देश और देशवासी इस परिवर्तन से अनभिज्ञ रहे और समय अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ गया.

जहाँ गाँधी जी ने आजादी के वक़्त बंटवारे की नींव रखी, वही नेहरु जी ने भारतीय राजनीति में वंशवाद की नींव रखी जिसमे तुष्टिकरण का सीमेंट लगाया, आरक्षण की मिटटी लगाईं और हिंदी, अहिन्दी भाषी दीवार खड़ी कर दी. नेहरु जी ने रूस और चीन के नक़ल करते हुए सार्वजनिक उद्योग के मॉडल का अनुसरण किया जो आज विश्व में हर जगह पूरी तरह से फ्लॉप हो चुका है.

इस बार के चुनाव परिणाम देख कर लगता है कि, जरुरत से ज्यादा अति होने के बाद, अब शायद बिहार जनता को अक्ल आ गई है लेकिन अभी उत्तर प्रदेश के लोगो में अक्ल आनी बाकी है। उत्तर प्रदेश में पिछले दो साल से कोई भी देशी या विदेशी औधोगिक घराना नहीं आया है. मुख्यमंत्री हजारो करोड़ रूपये खर्च करके अपनी प्रतिमाये लगा रही है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी को गिरफ्तार कर लिया जाता है, उनके ऊपर दलित उत्पीड़न की विभिन्न धाराएँ लगा दी जाती है और उनका घर जला दिया जाता है क्योंकि उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में एक दलित महिला के बलात्कार के बाद पुलिस महानिदेशक बिक्रम सिंह हेलीकॉप्टर पर औसतन सात लाख रूपये खर्च करके पीडिता को पच्चीस हज़ार रूपये देने जाते है. शायद तुगलकी राज्य जिसमे चमडे के सिक्के चलवाए गए थे वो भी इस कदर के जंगली राज से बेहतर रहा होगा. ये सब गाँधी नेहरु की गलत नीतियों के नतीजे है जिसकी वजह से सत्ता की चाबी गलत हाथो में पड़ गई और देश की राजनीती अपराधिक, जातिगत और दलगत हो कर रह गई.


हमारे यहाँ आजादी के समय से शुरू हुए लगभग सारे सरकारी उपक्रम शुरू से ही बुरी तरह घाटे में चल रहे है. घाटे में फंसे हुए और चरमराये हुए ये सरकारी उपक्रम अपने साथ साथ देश के विकास का भी बंटाधार कर रहे है. हाल ही में जब एयर इंडिया ने सरकार से पॉँच सौ करोड़ रूपये की मांग की तो वित्तीय संकट में फँसे सरकारी उपक्रम एयर इंडिया की हालत दुरुस्त करने के लिए सरकार ने सख़्त क़दम उठाने का निर्णय किया. सरकार ने कहाँ की एयर लाइन के बोर्ड में बड़ा रद्दोबदल होगा, इस क्रम में कुछ लोगों की छुट्टी भी की जायेगी और प्रबंध तंत्र में ऐसे लोगों को चुना जाएगा जो ईमानदार और प्रतिष्ठित होंगे. यानि की अब तक बेईमान और अप्रतिष्ठित लोगो को प्रतिष्ठामान बना कर सरकार जो छल कर रही थी उसे रोकने का प्रयास किया जायेगा.

चलिए देर से ही सही केंद्र सरकार को अगर ये समझ आ गया है की सरकार का काम निति निर्धारण करना है और उद्योग धंधे चलाना सरकार का काम नहीं उद्योगपतियों का काम है तो सचमुच काफी फक्र की बात है. हाल ही में सरकार ने दो अच्छे निर्णय लिए है. हाल ही में इंफ़ोसिस के सह-संस्थापक नंदन निलेकनी जिनका नाम टाइम पत्रिका की 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल है उनको सरकार ने यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी का प्रमुख बनाया गया है. भारत जैसे विशाल देश में इतने बड़े प्रोजेक्ट को अगर सफल बनाना है तो उद्योग जगत के इस तरह के लोगो के सहारे ही बनाया जा सकता है.

दूसरी सकारात्मक खबर ये है की एयर इंडिया के बोर्ड के अध्यक्ष श्री रतन टाटा को बनाया जा रहा है। रतन टाटा ने इसकी अनौपचारिक सहमती दे दी है और जल्द ही प्रधानमंत्री इस बारे में घोषणा करेंगे। यानि नेहरूजी ने जिस एयर लाइन को टाटा से लिया था आज सरकार उसे कंगाल और खस्ताहाल करके टाटा कर रही है.

सरकार के ये दोनों निर्णय एक बोझल बजट के बाद कुछ अच्छे संकेत है. लेकिन इसमें सबसे बड़ी समस्या क्रियान्वन की है. सरकार उच्च पदों पर सही व्यक्ति आसीन कर दे जो सही निति निर्धारण और फैसले ले सके, लेकिन अन्तोगत्वा कार्य तो सरकारी अधिकारी और बाबु ही करेंगे

सरकार पहले भी श्री राजीव गाँधी के समय १९८४ में अमेरिका से डा. सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा या डा. सैम पित्रोदा को जिनके नाम पर बेल लैब अमेरिका में कई पेटेंट है, भारत लाकर C-DOT का अध्यक्ष बनाया था. डा. पित्रोदा ने देश में STD/ISD सेवा के माध्यम से उस वक़्त दूरसंचार क्षेत्र में क्रांति ला दी थी और कई हज़ार रोजगार भी उत्पन्न किये थे. लेकिन फिर वी पी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद इन पर राजनितिक और भ्रष्टाचार के आरोप लगे और एक हर्दयघात के बाद इन्हें पुनः अमेरिका लौटना पड़ा.

अगर नंदन निलेकनी और रतन टाटा जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों को बिना सरकारी हस्तक्षेप के दफ्तरशाही से मुक्त रख कर अपना काम करने की इजाजत दी जाए और उन्हें खुद अपनी टीम चुनने का अवसर दिया जाए तब जा कर सरकार के इस निर्णय के कुछ सकारात्मक नतीजे मिलने की सम्भावनाये है।

एयर इंडिया

१९२९ में पायलट का लाईसेन्स लेने के बाद जे.आर.डी टाटा ने सत्राह साल बाद १९४६ में देश में पहली विमान सेवा टाटा एयरलाइन्स शुरू की थी. देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, ने अपनी की हुई गई बड़ी गलतियों में एक गलती का इजाफा करते हुए, में इसे राष्ट्रीकृत कर के एयर इंडिया बना दिया.

करीब सात दशक बाद, मार्च २००७ में, अब तक अपने अस्तित्व को खोज रही, इंडियन एयरलाइन्स और एयर इंडिया के विलय को मंत्रिमंडल ने मंज़ूरी दे दी गई और उम्मीद की जा रही थी की इस भारतीय विमानन क्षेत्र की सबसे बड़ी एयरलाइन का कारोबार लगभग 15 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक होगा. सरकार ने तब कहा था कि दोनों कंपनियों के एकीकरण में एक या दो साल लग सकते हैं लेकिन विलय से एक बड़ी कंपनी अस्तित्व में आएगी. विलय पर लगभग दो अरब रुपए खर्च होंगे लेकिन सालाना लाभ में लगभग छह अरब रुपए की बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद थी.

आइये अब दो साल बाद जमीनी हकीक़त से जरा रूबरू हो जाए. छः अरब का मुनाफा तो दूर, अनुमान है कि इस साल एयर इंडिया को क़रीब पाँच हज़ार करोड़ रुपए का घाटा हुआ है और कंपनी को अपने कर्मचारियों को देने के लायक वेतन भी नहीं है. वित्तीय संकट में फँसे सरकारी उपक्रम एयर इंडिया की हालत दुरुस्त करने के लिए सरकार ने सख़्त क़दम उठाने का निर्णय किया है. सरकार के मुताबिक़ इस राष्ट्रीय एयर लाइन के प्रबंध तंत्र में 30 दिन में भारी फेरबदल किया जाएगा. प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि प्रबंध तंत्र में ऐसे लोगों को चुना जाएगा जो ईमानदार और प्रतिष्ठित होंगे.

उन्होंने विश्वास जताया कि दो साल के भीतर एयर इंडिया की हालत ठीक हो जाएगी. पहले सात दशक फिर दो साल और अब दो साल के बाद, अभी भी वो ही दो साल. मंत्री बदल गए, सरकार फिर से आ गई लेकिन ये दो साल तब से लेकर अब तक टस से मस नहीं हुए. वाह साहब वाह, ये गोया दो साल नहीं हो गए कोई मर्द की जुबान हो गई, एक बार बोल दिया तो बस बोल दिया.

एक बार फिर से सरकार टाटा की शरण में है. बस फर्क ये है की दशको पहले, पिछली बार सरकार ने जे.आर.डी टाटा से एयरलाइन्स ले ली थी और अब उनके भतीजे रतन टाटा को ये एयरलाइन्स को खस्ताहाल में सँभालने को कह रही है. खबरों के मुताबिक रतन टाटा इस बात पर राजी हो गए है और जल्द ही प्रधानमंत्री इसकी घोषणा कर देंगे.

माना की इस समय विश्व की लगभग सभी विमान कंपनियां (कुछेक अपवाद अभी भी है) घाटे में चल रही है और इसका मुख्या कारण पिछले साल तेल की कीमतों में लगी आग और विश्व आर्थिक मंदी को जाता है पर हमारी एयरलाइन का तो जन्म ही घाटे में चलने के लिए हुआ लगता है। हमारे यहाँ पर प्रति विमान दो सौ तीस (२३०) कर्मचारी है जो विश्व में अन्य एयर लाइंस से एक तिहाई से ज्यादा है. इतने कर्मचारी होने के बावजूद घटिया सेवा और यात्रियो के प्रति उदासीनता का चलते कोई भी एयरलाइन रेटिंग एजेन्सी इस एयरलाइन को तीन सितारा विमान कंपनी से ऊपर का दर्जा देने को तैयार नहीं है. सरकार एक आदेश जारी कर के सभी सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को सरकारी खर्चे पर देश और विदेश में यात्रा करने के लिए केवल एयर इंडिया को अधिकृत करने का मन बना रही है.

आप जबरदस्ती करके कुछ सरकारी कर्मचारियों को जबरदस्ती एयर इंडिया की सैर भी करवा देंगे तो क्या उससे घटा ख़त्म हो सकेगा. याद रखे ये वो ही एयर इंडिया है जिसने अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री होते हुए एक वक़्त प्रधानमत्री के विशेष विमान के यूरोप से लौटते समय प्रधानमंत्री तक को बासी खाना दे दिया था जिसकी प्रधानमंत्री ने औपचारिक शिकायत दर्ज करवाई थी. आप प्यासे को कुँए तक ले जा सकते है लेकिन पानी थोडी ही पिला सकते है. बजाये इसके की सरकार इस तरह की कोई बेतुकी निति अपनाए, सरकार को चाहिए की विमान परिचालन गतिविधियों में व्यावसायिक कौशल और सुधार लाये। और ये ही बात अमूमन देश के हर उद्योग पर लागु होती है जिसे आज सरकार चला रही है।
(अगले लेख में केंद्र सरकार के हाल में किये हुए कुछ अच्छे फैसलों पर एक नज़र)