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सत्ता के गलियारों में बैठे हुए नमूनों का एक और तमाशा

कल से ही देश की राजनीती में उबाल आया हुआ है। देश की राजनीति का विभत्स्य रंगमंच कहे जाने वाले प्रदेश यानि, उत्तर प्रदेश में कल से ही एक नए नाटक का विमोचन हो रहा है जिसके मुख्य पात्र है हज़ार करोड़ से ज्यादा समाप्ति की मालकिन, एक अनुसूचित दलित की बेटी जिसके पास आम आदमी तो क्या उसकी पार्टी के नेताओ तक का पहुंचना नामुमकिन है और जिसकी सुरक्षा में दो दर्ज़न देश के उत्कृष्ट कमांडो लगे रहते है. तो एक तरफ ये दलित की अरबपति बेटी, उसके हजारो गुंडे (इसको सरकारी तंत्र, सरकारी कर्मचारी और पार्टी के कार्यकर्ता पढ़े) और दूसरी तरफ है नपुसंक राष्ट्र की सत्ता की बागडौर सँभालने वाली कांग्रेस पार्टी. जिसकी सत्ता की रगों में आज भी उस महात्मा गाँधी का खून दौड़ता है कि अगर कोई एक गाल पर थप्पड़ मार दे तो दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए. दरअसल एक वाक्य में कहा जाए तो ये गुंडों और नापुसंको के बीच का विवाद है. वैसे तो इन दौ कोडी के लोगो पर कुछ लिख कर अपना कीमती समय ख़राब करने का मन नहीं होता पर क्या करू इतना हल्कापन देख कर खून खौल उठता है और देश के इस अफसोसजनक हालत पर शायद आज एक आम आदमी इसी तरह अपने क्षोभ की अनुभूति कर सकता है. .

अब जरा देश के मीडिया पर भी एक नज़र. हमारा मीडिया देश के कर्मठ नौजवान और कमांडो को मरवाने की चिंता किये बिना ही मुंबई हमलो का सीधा प्रसारण दिखा कर अपनी टीआरपी बढाने में शान समझता रहा. इस घटना ने सरकार की लाशो की गिनती बढ़वाने में काफी मदद की (होश उडाने वाला विडियो नीचे के मुंबई हमले से सम्बंधित पोस्ट में अवश्य देखे). आज ये सेकुलर मीडिया ये बतलाने में संकोच कर रहा है कि ऐसा भी डा. रीता बहुगुणा जोशी ने क्या कह दिया. बलात्कार की खबर को चटखारे ले कर छापने वाला मीडिया इसके बारे में दिए गए बयान को लिखने में संकोच कर रहा है.

ऐसा सुनने में रहा है की रीता बहुगुणा ने रीता जोशी ने राज्य में बलात्कार की शिकार बनी महिलाओं को राज्य सरकार की ओर से मुआवज़ा दिए जाने पर एतराज़ जताते हुए हाल में अपने भाषण में इस बात का उल्लेख किया था कि जब किसी दलित महिला के साथ बलात्कार होता है तो पुलिस महानिदेशक बिक्रम सिंह मुरादाबाद, मथुरा और दूसरे जिलों में हेलीकॉप्टर से जाते हैं और 25 हज़ार रूपए का मुआवज़ा देते हैं जबकि उनके हेलीकॉप्टर पर सात लाख का खर्च आता है. आगे रीता ने ऐसा कहाँ बतलाते है कि "हो जाए तेरा (मायावती का) बलात्कार, हम देंगे 1 करोड" -- यही वो कथन है जिस पर बबाल हो रहा है. इसमें कोई दो मत नहीं की ये टिपण्णी सरासर गलत है, और शायद रीता ने इसके लिए माफ़ी भी मांग ली बतलाते है, लेकिन क्या ये टिपण्णी औरैया में इंजीनियर मनोज कुमार गुप्ता की उनके घर में घुस का बेरहमी से बहुजन समाज पार्टी के विधायक शेखर तिवारी द्वारा करंट लगा कर और पीट-पीटकर कथित हत्या से भी घिनौनी है. रीता ने टिपण्णी की और मायावती के लोगो ने मायावती के जन्मदिन पर हर साल आर्थिक सहयोग दिवस के नाम पर खुल कर कर रही लुट और हत्या का कोई हिसाब नहीं.

मेरे विचार से जब देश में चारा खाने वाले, हत्या, बलात्कार, आतंकवाद करने वाले लोग न केवल खुले घूम रहे है बल्कि सम्पूर्ण सुरक्षा के साथ संसंद के गलियारों में बैठे है, तो फिर इस कथन को कहने वाले को न्यायिक हिरासत में लेना कही से भी न्यायसंगत नहीं लगता. अदालत भी अपने आप में एक नमूना है. हजारो करोड़ की अपनी खुद की मूर्तियाँ जो मायावती लगवा रही है सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए, उस पर रोक तक लगाने से मना कर दिया है. इससे पहले एक राज्यपाल मायावती के खिलाफ CBI जांच की इजाजत देने से भी इनकार कर चुके है.

यानि अन्य महिलाओं (चाहे वो दलित हो, नाबालिग हो या कोई भी स्त्री हो) उस राज्य में अगर उस पर कोई अत्याचार हो जाए तो सरकार सात लाख रूपये के उड़नखटोले में बैठ कर उसे पच्चीस हज़ार रूपये दे कर अपने कर्तव्य से इतिश्री कर लेती है. लेकिन ऐसा अगर कोई मुख्यमंत्री के बारे में सोच या बोल दे तो उसकी खैर नहीं.

उसके ऊपर मायावती ने रीता जोशी मामले पर एक संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस के सदस्यों को खुल्मखुल्ला धमकाया है और कहा है कि रीता जोशी का अपराध माफ़ करने योग्य नहीं है. उनका कहना था, "वरुण गाधी की तरह रीता को भी कुछ समय के लिए चाहे ज़मानत मिल जाए लेकिन इससे इस महिला का अपराध कम नहीं होता.देर सवेर क़ानून के तहत उसे सज़ा ज़रूर मिलेगी. मैं कांग्रेस के लोगों को चेतावनी देना चाहती हूँ कि कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष के किए कृत्य को दबाने के लिए क़ानून को अपने हाथ में न लें, नहीं तो उनसे सख़्ती से निपटा जाएगा."

प्रदेश में गुंडागर्दी अपने चरम पर है, सरकारी तंत्र मुख्यमंत्री चाहे वो कोई भी हो, उसके तलुवे चाटता हुआ अपना उल्लू सीधा करने में लगा है. हम चाहे देश की प्रगति की जितनी भी बाते कर ले, जमीनी हकीक़त ये ही है की देश आज भी राजा, प्रजा और गुलाम प्रथा में ही चल रहा है. फर्क इतना है की आज राजा गुंडे, मवाली अपनी जांत और बाहुबल के कारण बनते है. पहले कहते थे यथा राजा तथा प्रजा पर आज शायद लगता है यथा प्रजा तथा राजा. तो ये प्रजा जिस तरह की है या जिस तरह की प्रजा वोट देने जाती है वैसी ही सरकार बनती है और वैसा ही राज्य होता है

आज राजनीती में जिस तरह के लोग आ गए है उनसे तो उम्मींद करना बिल्ली से दूध की रखवाली करवाने के समान ही है। आइये दुआ करे की देश की डोर कुशल और योग्य लोगो के हाथ में आये जो देश की सही दशा और दिशा का निर्धारण कर सके ताकि ये बलात्कार की सियासत बंद हो और जो पीड़ित है उन्हें जल्द से जल्द न्याय मिले.

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