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संत कबीर के दोहे

कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। उनकी कविता का एक-एक शब्द पाखंडियों के पाखंडवाद और धर्म के नाम पर ढोंग व स्वार्थपूर्ति की निजी दुकानदारियों को ललकारता हुआ आया और असत्य व अन्याय की पोल खोल धज्जियाँ उडाता चला गया। कबीर का अनुभूत सत्य अंधविश्वासों पर बारूदी पलीता था। सत्य भी ऐसा जो आज तक के परिवेश पर सवालिया निशान बन चोट भी करता है और खोट भी निकालता है। आइये इस महान संत के कुछ अविस्मरणीय दोहो का आनंद ले :

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय ॥

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान |
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ||

सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज |
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ||

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये |
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ||

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर |
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ||

निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें |
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए ||

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय |
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ||

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय |
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ||

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे |
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ||

पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात |
देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात ||

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये |
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ||

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार |
फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ||

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब |
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ||

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग |
तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग ||

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप |
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप ||

जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान |
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण ||

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश |
जो है जा को भावना सो ताहि के पास ||

जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान |
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान ||

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए |
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए ||

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग |
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ||

तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार |
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ||

तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय |
सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए ||

प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए |
राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए ||

जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही |
ते घर मरघट जानिए, भुत बसे तिन माही ||

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत |
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||

उजल कपडा पहन करी, पान सुपारी खाई |
ऐसे हरी का नाम बिन, बांधे जम कुटी नाही ||

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही |
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ||

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए |
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ||

प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय |
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ||

प्रेम भावः एक चाहिए, भेष अनेक बनाये |
चाहे घर में बास कर, चाहे बन को जाए ||

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम |
कहे कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुना दाम ||

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर ॥

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय |
भागत के पीछे लगे, सन्मुख आगे सोय ||

मन दिना कछु और ही, तन साधून के संग |
कहे कबीर कारी दरी, कैसे लागे रंग ||

काया मंजन क्या करे, कपडे धोई न धोई |
उजल हुआ न छूटिये, सुख नी सोई न सोई ||

कागद केरो नाव दी, पानी केरो रंग |
कहे कबीर कैसे फिरू, पञ्च कुसंगी संग ||

कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर |
जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर ||

जाता है तो जाण दे, तेरी दशा न जाई |
केवटिया की नाव ज्यूँ, चडे मिलेंगे आई ||

कुल केरा कुल कूबरे, कुल राख्या कुल जाए |
राम नी कुल, कुल भेंट ले, सब कुल रहा समाई ||

कबीरा हरी के रूठ ते, गुरु के शरणे जाए |
कहत कबीर गुरु के रूठ ते, हरी न होत सहाय ||

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी |
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ||

कबीर खडा बाजार में, सबकी मांगे खैर |
ना काहूँ से दोस्ती, ना काहूँ से बैर ||

नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय |
कबीर शीतल संत जन, नाम सनेही होय ||

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय |
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ||

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय |
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय ||

शीलवंत सबसे बड़ा सब रतनन की खान |
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ||

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये |
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाए ||

माखी गुड में गडी रहे, पंख रहे लिपटाए |
हाथ मेल और सर धुनें, लालच बुरी बलाय ||

सुमिरन मन में लाइए, जैसे नाद कुरंग |
कहे कबीरा बिसर नहीं, प्राण तजे ते ही संग ||

सुमिरन सूरत लगाईं के, मुख से कछु न बोल |
बाहर का पट बंद कर, अन्दर का पट खोल ||

साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय |
ज्यों मेहंदी के पात में, लाली रखी न जाए ||

संत पुरुष की आरती, संतो की ही देय |
लखा जो चाहे अलख को, उन्ही में लाख ले देय ||

ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार |
हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ||

हरी संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप |
निश्वास सुख निधि रहा, आन के प्रकटा आप ||

कबीर मन पंछी भय, वहे ते बाहर जाए |
जो जैसी संगत करे, सो तैसा फल पाए ||

कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार |
साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ||

आये है तो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर |
इक सिंहासन चढी चले, इक बंधे जंजीर ||

ऊँचे कुल का जनमिया, करनी ऊँची न होय |
सुवर्ण कलश सुरा भरा, साधू निंदा होय ||

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय |
भक्ति करे कोई सुरमा, जाती बरन कुल खोए ||

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय |
मीठे वचन सुना के, जग अपना कर लेय ||

लुट सके तो लुट ले, हरी नाम की लुट |
अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेगे छुट ||


तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का, तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला, तिन का तिन के पास॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए,
माली सींचे सौ घडे, ऋतू आये फल होए

मांगन मरण सामान है, मत मांगो कोई भीख,
मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख

ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि.
मूरख लोग न जानिए , बाहर ढूँढत जाहिं

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये,
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये

62 comments:

Anonymous said...

bahut khoob Bhavesh ji. Here are few more...

dheere-dheere re mana
dheere sab kuch hoy
mali seeche so gharaa
ritu aaye fal hoye.

maangan maran samaan hei
mat mange koi bheekh
maangan se marna bhala
ye satgur kee seekh.

jyo nainan mei putli
jeevat hee karo aas
jeevat karam ki fansee naa kaati
mare mukti ki aas.

--Deepali

Bhavesh (भावेश ) said...

दीपाली जी, आपके द्वारा सुझाये गए दोहे भी जोड़ कर इस पोस्ट में प्रकाशित कर दिए गए है. धन्यवाद.

Devendra said...

kabir ke dohe ka kya kahna, kya sochte the unke sochawat me bhi baut majedar bbat tha,
kabir was great,.....

PRIYA said...

THNK YOU VERY MUCH BHAVESHJI , I FOND OF KABIRSAHEB'DOHA.GREAT SAINT OF INDIA. I FEEL TO READ AND I GOT HERE IN YOUR BLOG THANKS AGAIN

Ravindra said...

THANK U SIR, I VERY MUCH ENJOYED WITH DOHES AND WANT TO ADD THIS............


KABIRA JAB HAM PAIDA HUE JAG HANSE HAM ROYE
AISEE KARANI KAR CHALO PACCHE HANSI NAA HOYE

Ravindra paudyal,kathmandu

Bhavesh (भावेश ) said...

Ravindraji, thanks for your suggestion. The doha suggested by you has also been added to the list albeit with a minor twist.

Ravindra said...

Dear Bhavesh, Thaks for ur prompt rsponse. Is there any limitations to participate in ur blog. May I add some more or not, bcoz im very much crazy of Saint KABIR and Abdur Rahim Khankhna.
Thanks again
Ravindra K paudyal

aman said...

kabir's dohe r the best
man halka ho jata hai aur shanti milti hai...........
i love these dohe

yash said...

bhavesh ji, bahut achche. aapne umeed se bhi zaada dohe likh dale! kamal ho gaya. aise hi aap aur bhi dohe likthe rahiega. desh mein aap jaise logon ki sakth zaroorat hai. badhaii ho.

Anonymous said...

excellent bhavesh ji .i liked your passion for writing dohas of kabir.here are few more.........

kabira ve nar mar chuke
je kahu magan jahee
unte pehle ve mare
jinmukh nikshat nahi.

kakar pathar jori ke
masjid leyi banaye
ta chad mulla bag de
kya behra hua khudaye............

pathar puje hari mile
to main pujo pahad
tate yeh chakiya bhali
pees khaye sansar .

narendra pal said...

bahut khoob Bhavesh ji. Here are few more...

dheere-dheere re mana
dheere sab kuch hoy
mali seeche so gharaa
ritu aaye fal hoye.

maangan maran samaan hei
mat mange koi bheekh
maangan se marna bhala
ye satgur kee seekh.

jyo nainan mei putli
jeevat hee karo aas
jeevat karam ki fansee naa kaati
mare mukti ki aas.

narendra pal said...

excellent bhavesh ji .i liked your passion for writing dohas of kabir.here are few more.........

kabira ve nar mar chuke
je kahu magan jahee
unte pehle ve mare
jinmukh nikshat nahi.

kakar pathar jori ke
masjid leyi banaye
ta chad mulla bag de
kya behra hua khudaye............

pathar puje hari mile
to main pujo pahad
tate yeh chakiya bhali
pees khaye sansar .

radhika agrawal said...

EXCELLENT BHAVESH JI. AND THANX FOR SUCH INFORMATION. IT HELPED ME A LOT.....

Sunita said...

It's real wonderful service to the public. I am very much appriciate if we know the meanings of those 'Thohes' then it would be like 'SONE PE SUHAGA' Bhaveshji.

Hope soon we will receive the same here.

Sunita S P

jr said...

mahan sant kabir purn braham ka roop the.unki vanee amar rahegi.
jr madia blt

Anonymous said...

murti puja nahi karni chahie mei uske virudh hun har saal ganeh ki murti, ravan ki murti ththa anya murti banakar rupye ko nast nahikarna chahie iske jagah gario ko rupya bant dena chayhe gariboi seva hi param seva dharm hai

H R Dhaka said...

The teachings of the Kabir make the real sense in the life. They are more relevant in todays materialistic era.

LIAQUAT HUSSAIN said...

kabira is jag aaiyke jag mey kiya prakash
sab niche hi choote gaye aap gaye aakash

d_sagoi2011 said...

Too kahata kagaj ke lekhi main kahata akhan ki dekhi- kabir das ji... kamal ke dohay hain Thanks

Cp. Jack sparrow said...

Excellent work dear, your work is great... sab kuch dil ko chu gaya..
One more you left....

KARAT-KARAT ABYAS TE JADMATI HOT SUJAN.
RASRI AAVAT JAAT TE SIL PAR PARAT NISHAN.

ankita said...

its really nice.. hats off.

shivani said...

great job is done by u
these lines will always influence new generation.

Dr. shyam gupta said...

क्या फ़ायदा...रोता होगा कबीर...सब ने टिप्पणी अन्ग्रेज़ी में दी जिसे कबीर पढ नहीं पायेगा...

GSTARIYAL said...

KABIR KE DOHE VERY GOOD

balbir said...

aap ne kuch nahi samja kewal ak kavi samaj kar kabirsahib ko vastav mein whe parampurus h

Anonymous said...

wth v cant even copy the contents of this page. The creater is waste

SANJEET said...

i love sant kabir he was a great man of india

Anonymous said...

It was really nice to just see the Kabir's dohe.

Thanks.

Pritesh said...

it's really great Bhaveshji bachpan ki yaadein taja ho gayi..

Deepak.E said...

bhavesh ji.its really great work.this had hlpd me very much in my project.my frnds too said me to thank the one who did this.

Deepak.E said...

bhavesh ji.its really great work.this had hlpd me very much in my project.my frnds too said me to thank the one who did this.

ashish sharma said...

itna to maine school me bhi nahi padha,achcha collection h.
well job

Rahul said...

SANT KABIR NA DOHA MANE BAU GAME 6E
KARANKE TEMNA DOHA MATHI MANE BAU
SIKHAMAN MADE 6E ANE.........

Acharya Jee said...

kabir ji ke dohe padhkar aatmsakshatkar ho jata hai

Sanjay Jain said...

Kabir ji ke dohe jivan ke har kadam par kam aate hai!

ganesh jaiswal said...

kabir ke dohe se es bha-doun ke gindgi me bahut man ko shanti milta hai /

Anonymous said...

because of you i was able to compete my project
thankyou

Anonymous said...

thankyou kabir because you help me so much

Anonymous said...

I <3 sn't kbir he's dohey's r esi 2 undrstnd & can b usd in every day life .................he had also strggld aftr he was born....i felt very happie dat his memories r still alive

deep.soham said...

Kabir ke sabhi premio se main vinti karta hun apne apne isht dev , shri gurudev or dharmon ke anusaar nitya pratidin bhajan jarur kare bhajan ki shakti se hum is sansaar main or parlok main kuch samman pa sakte hain apne guru ke vachno par pura bharosa rakho idhar udhar to bohat kuch hai parantu sidha marg to gurug ka hi hai wo hai bhajan sadhna.

Jai shri guru maharaj ji ki.

Anonymous said...

ek doha
duniya kaise bavari pathar pujan jaye
ghar ke chakiya koi na puje jako pese khaye.
hitesh

Anonymous said...

Sant kabir had taken rebirth as yugdrista ''pandit sri ram sharma acharya''. who has written 32000 books along with veda'stranslation. if you want to take more details ,visit to 'SHANTIKUNJ HARIDWAR''

Anonymous said...

Sant kabir had taken rebirth as yugdrista ''pandit sri ram sharma acharya''. who has written 32000 books along with veda'stranslation. if you want to take more details ,visit to 'SHANTIKUNJ HARIDWAR''

Anonymous said...

Sant kabir had taken rebirth as yugdrista ''pandit sri ram sharma acharya''. who has written 32000 books along with veda'stranslation. if you want to take more details ,visit to 'SHANTIKUNJ HARIDWAR''

Bhagat Singh Panthi said...

कबीर जी के दोहे रूपी रत्नों को यहाँ प्रकाशित करने हेतु धन्यवाद

Anonymous said...

Bhavesh sir, i very much liked the dohas and enjoyed them but i request u 2 add some more so as to get more teachings from SANT KABIR....
THANK U

Mantosh bhai said...

चलता मानुस क्या करे
सब खुदा की मर्जी
दिन ही महान है
यहीँ कबीर की अर्जी

Mantosh bhai said...

(Yah desh nirala mit jayega
ram nam ka nara hai
bach sakte ho to bach lo
kal kaal ke rup me aane wala hai)
take it seriout otherwise u will do bad work and will be sent to Jail.

Mantosh bhai said...

Hi! Frnd i am Mantosh tiwari from Padrav, itayen ,jaunpur.At this time i am doing computer engineering for best sailary in future.

Mantosh bhai said...

Baith kabira kya kare
likhan laga lekh
ab nhi jiya jaat hai
hua itna ghuspaith.thank to all.

Anonymous said...

kabira teri ghopdi hai gal katiyan ke pass.jo karenge so bharenge tu kyon bhey udas

pranav said...

please write there meanings too

pakaj sharma said...

just add this also:

kabira teri kutiya gal katiyan ke pass.jaisa karega vaisa bharega tu kyon bhey udas.


means apne aap ko sahi rakho , doosro ke bure se koi farak nahi padta chahe woh aapke kitne bhi kariba hai.

Wattsusu said...

Bhavesh sir, i very much liked the dohas and enjoyed them but i request u 2 add some more so as to get more teachings from SANT KABIR.... THANK U

Anonymous said...

AMAR LOK SE HUM CHALI AAYE AAYE JAGAT MANJHARA HO
JAGAT JEEV JAB BHAYE DUKHARI TA KARAN
PAG DHARA HO

SATYA PURUSH EK PED HE NIRANJAN BAKI DAR
TEEN DEV SHAKHA BHAYE PAT BHAYO SANSAR

Mukesh Kumar said...

bhala jo khojan main chala bhala na miliya koi jo dil khoja aapana dil sa bhala na koi

Anonymous said...

bht hi badhiya,sirf padhna hi kafi nhi,agar in bato ko jivan me utar liya jaye to jiwan safal ho jayega aur atam aur atma ka parmatma se milan bhi..........bht bht dhanyavad bhavesh ji

SANTLAL BHARTIY said...


kabir anya santo me sabse mahan the.ve ase sant the jo us samay samaj me byapt kuritiyo ko khatm karna chahte the.ve murtipuja ke virodhi the.ve apne doho ke madhyam se samaj ko gyan ka prachar kiya .kabir jasa sant aaj tak nahi huye.ve samaj me jati, darm ke nam par ho rahe atyachar aur shoshan ke khilap avaj uthae.unke dvara kiya gaya yah prayas sarahani hai.

Anonymous said...

Aaj badlati duniya kal ki baat purani,
naye daur par hum chale bhul gaye sari kahani,
jai hind!!!

Anonymous said...

very nice....
bachpan ki yaad aa gayi...
dil kush hua.....
dhanyavaadh.....

Anonymous said...

Teri Nigahon Ke Yoon Hi Kayal The Hum
Kya Jaroorat Thi Aajmane Ki
Yoon Hi Behosh Pade Hai Teri Rahon Main
Kya Jaroorat Thi Alag Se Muskurane Ki…

radhika pai said...


दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय |
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ||
really true