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भला उसका धर्म मेरे धर्म से अच्छा कैसे ?


करीब दो दशक या उससे भी पहले, भारत में टीवी पर एक विज्ञापन आना शुरू हुआ था, "भला उसकी साडी मेरी साडी से सफ़ेद कैसे" ठीक वैसा ही हम आज भी देख रहे है जब लोग अनजाने में ही सही कह रहे है "भला उसका धर्म मेरे धर्म से अच्छा कैसे ?" वो ये सिद्ध करना चाहते है कि सदियों पहले लिखे गए हिन्दू धर्म ग्रंथ में जो कुछ लिखा है वो केवल गलत है, और शायद उनके धर्म की एक मात्र पुस्तक ही सब ज्ञान देती है.

वो ये सोचते है कि चूँकि उनका ज्ञान असली है इसलिए अनादि काल से आज तक इस धरा पर जितने भी अनगिनत ऋषि, मुनि, योगी, तपस्वी हुए है जिन्होंने न केवल स्वयं ब्रहा से साक्षात्कार किया है बल्कि अन्य लोगो को भी उस ब्रहा तक पहुचने के जो विभिन्न मार्ग बतलाये है वो सब भ्रम है.

इन दिनों इस विषय पर इन दिनों बहुत तर्क हो रहा है. इस पर काफी लोगो ने, जिसमे मैं स्वयं भी शामिल हूँ, अपने अपने विचार और पक्ष रखे है. मैं इस मत से पूर्णत सहमत हूँ, की दुसरे धर्म के बारे में कुछ भी अनाप शनाप लिखना न केवल दुर्भावनापूर्ण है बल्कि अपमानजनक और दुर्भाग्यपूर्ण भी है. लेकिन क्या हम इतने कमजोर है की किसी एक व्यक्ति या कुछ समूह के द्वारा लिखे गए अनर्गल वार्तालाप को अपने ऊपर हमला समझ ले. मैं एक बार इनके ब्लॉग पर गया और जब ये पाया की यहाँ पर इनकी जिज्ञासा नहीं बल्कि धर्म को नीचा दिखा कर बेइज्जत करने का खेल हो रहा है तो मैंने उस ब्लॉग पर जाना और उसे पढना बंद कर दिया, फिर चाहे वो ब्लॉग, किसी भी कारण से, ब्लोगवाणी की हिट्स में रोज ही प्रथम स्थान क्यों न प्राप्त कर रहा हो.

ये कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी की हिन्दू धर्म में हर चीज़ कि जितनी व्याख्या की गई है, जितना विस्तृत विश्लेषण किया गया है और हर बात को जितना विस्तृत तौर पर समझाया गया है वो वाकई कमाल है. अफ़सोस आज के समय में अक्सर किसी चीज़ को जरुरत से ज्यादा समझाना भ्रम का भी कारण बन जाता है और शायद ये ही मुसीबत की जड़ है.

क्या आप जानते है कि हम लोग भगवान् से कई मुख्यत तीन तरह का रिश्ता रखते है -- सेवक का, साख्य (मित्र) का या शत्रु का. हमारे प्रभु इतने दयालु है की शत्रु भाव रखने वाले को अन्य भाव से भजने वालो से ज्यादा प्यार करते है. अगर विश्वास नहीं होता तो सोचिये क्यों भगवान् श्री कृष्ण ने शिशुपाल को तारते. उन्होंने उसका उद्धार इसलिए नहीं किया वो उनका रिश्ते में भाई लगता था, बल्कि इसलिए किया क्योंकि वो भगवान् को शत्रु भाव से पूजता था.

दरअसल जब हम किसी से शत्रु भाव रखते है तो खाते-पीते, उठते-बैठते, सोते-जागते हर समय जाने अनजाने हमारे दिमाग में हमारे उस शत्रु का ही ख्याल रहता है. इसी तरह से हूँ कही न कही उससे जुड़ते जाते है. इसलिए जब कोई भगवान् को शत्रु भाव याद करता है तो उस पर भगवान् जल्दी प्रसन्न हो जाते है. तुलसी बाबा ने रामचरितमानस में भी लिखा है :
भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से तो दसों दिशाओं में कल्याण होता है।


हर चीज़ को देखने के दो नजरिया होते है. एक कहता है कि गिलास आधा खाली है और दूसरा देखता है कि वो ही गिलास आधा भरा हुआ है. दोनों ही सही है. ठीक इसी प्रकार से बेशक अगर कोई गलत ढंग से दुष्प्रचार करने का कार्य कर रहा है तो हम ये सोचे कि इस बहाने से ही सही, वो अपना कुछ समय प्रभु नाम पर शोध करने और टाइप करने में तो लगा रहा है. कही तो उसके ध्यान में भगवान् तो आ रहे है. बस भगवन से इतनी नजदीकी इनकी व्यक्तिगत सफलता के लिए काफी है. हमारे तुलसी बाबा ने कह दिया है :
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥ गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत जोगी॥1॥
श्री रघुनाथजी अत्यंत कोमल चित्त वाले, दीनदयालु और बिना ही करण कृपालु हैं। गीध (पक्षियों में भी) अधम पक्षी और मांसाहारी था, उसको भी वह दुर्लभ गति दी, जिसे योगीजन माँगते रहते हैं॥


फिर हम तो आखिर में इंसान है. शास्त्रों में भी एक कथा आती है कि एक चोर जो शिवरात्रि के दिन सुबह से ही भूखा था वो प्रभु कृपा से रात को किसी गाँव के शिव मंदिर में पहुँच गया. वहां उसे शिवलिंग के ऊपर पानी की धार छोड़ता एक चांदी / सोने का लोटा लटका दिखा. अब उसने आव देखा न ताव और शिवलिंग पर खड़ा हो गया और लगा लोटा उतरने का प्रत्यं करने. बस उसी समय भोलेनाथ प्रकट हो गए और उसे वर मांगने को कहाँ. प्रभु ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि अन्य भक्त तो मंदिर में आकर भगवान् को एक लोटा जल, या दूध या पंचामृत चढ़ाते थे पर इस भक्त ने तो खुद को ही शिव को अर्पित कर दिया था. तो भगवान् किस रूप में किसका कल्याण करते है ये केवल प्रभु ही जानते है.

इस बहसे से एक फायदा और हुआ. वो ये की इस बहाने से सही आप और हम भी कुछ भगवान् के बारे में चर्चा कर पा रहे है. दरअसल मुझे लगता है ये अन्य लोगो के ज्ञान की परीक्षा का समय है. धर्म को धारण करने का अर्थ धैर्यता दिखाना भी है. इस तरह के अनर्गल पोस्ट देखकर, हमारी भक्ति में कमी नहीं होती बल्कि वो और मजबूत होती है. इनसे हमें ये बेशक समझने में मदद मिलती है कि हमारे धर्म का कोई कैसे गलत निरूपण कर सकता है जिससे भ्रांतियां फैलती है. फिर कबीरदासजी ने भी तो कहाँ है : निंदक नियरे राखिये.....

तो इसी बहाने इन्हें भगवान् के बारे में कुछ पढने, लिखने और शोध करने दीजिये.

चूँकि यहाँ पर काफी बहस हो रही थी इसलिए ये एक पोस्ट बीच में ही लिखनी पड़ गई. भगवान राम और उनके चौदह वर्ष के वनवास का तात्पर्य समझे का प्रयास, राम और राम कथा दर्शन अगली पोस्ट में...

9 comments:

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

आलेख के मूल भाव से सहमत हूँ | पर ये कहना सरासर बेमानी है की "हमारे प्रभु ... शत्रु भाव रखने वाले को अन्य भाव से भजने वालो से ज्यादा प्यार करते है." यदि ऐसा है तो हम सब लोग सत्रु भाव ही रखें | तुलसीदास, मीराबाई, हरिदास, संत तुकाराम, गुरुनानक, अर्जुन सब लोग सत्रु का ही भाव रखते, क्यूँ?

कंश, रावन, शिशुपाल को भले ही मुक्ति मिल गई हो पर प्रभु का सामीप्य और प्यार ना मिला | प्रभु का सामीप्य तो सच्चे भक्तों को ही मिल पाता है |

जी.के. अवधिया said...

भावेश जी! हम तो आपकी बात को समझ रहे हैं किन्तु हमारे साथ आप और जिन लोगों को समझाना चाहते हैं वे कभी नहीं समझेंगे।

फूलहिं फलहिं न बेंत जदपि गरल बरसहिं सुधा।
मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम॥

kunwarji's said...

मैंने एक जगह पढ़ा था के

जहा धर्म या अध्यात्म होता है वहा उसके सिवाय कुछ और हो ही नहीं सकता!

वहीँ आगे था के अधर्म कही है ही नहीं!

मेरी तो समझ के परे की चीज लगी जी ये!



वैसे मै अवधिया जी से सहमत हूँ के "जिन्हें आप समझाना चाहते है वो कभी नहीं समझेंगे!"

कुंवर जी,

महाशक्ति said...

आपकी बातो से सहमत हूँ, ईश की निन्‍दा का अधिकार किसी को नही है। भगवान सभी के बराबर है यदि को‍ई किसी कि भावनओ को आहत करता है तो उसे सहने का भी साहस रखना चाहिये।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

राकेश जी, अवधिया जी, कुंवरजी और महाशक्ति जी से सहमत..

Anonymous said...

ये बात सही है, की इसी बाहने ही सही, ये ईश्वर देवी देवता को याद तो कर लेते है. हमें तो अपने धर्म के तेतीस करोड़ देवी देवताओ से ही फुर्सत नहीं मिलती इसलिए इनके ईश्वर का स्मरण होने का सवाल ही नहीं उठता.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

हम हिन्दुओं के साथ एक बड़ी दिक्कत ये है की हम अपने धर्म से जुड़े सत्य को जानने का भरसक प्रयास ही नहीं करते | इधर उधर के अधकचरे - आधे अधूरे ज्ञान में ही उलझ के रह जाते हैं | Anonymus जी को ही देख लीजिये .. क्या फजूल की बाते कर रहे हैं ... बहुसंख्यक हिन्दुओं को देवी-देवता और वास्तविक इश्वर में कोई अंतर नहीं नजर आता | अब कितने लोगों को ये पता है की हमारे ३३ करोड़ देवी-देवता प्रशासनिक अधिकारी की तरह हैं जिनका काम प्रकृति में संतुलन बनाये रखना है, जैसे की वायु देव वायु के, वरुण जल के देवता हैं | वास्तव में सारे देवी-देवताओं एक इश्वर द्वारा ही निर्देशित होते हैं |

Bhavesh (भावेश ) said...

@ राकेश जी : आपकी दोनों टिप्पणियों के लिए धन्यवाद्. "शत्रु भाव रखने वाली" बात कहने का अर्थ इतना ही था की चाहे भाव या बिना भाव के कैसे भी कम से कम नाम तो जपा जा रहा है.
@ कुंवर जी, अवधिया जी, महाशक्ति आप सभी का टिप्पणी करने के लिए आभार.
@ Anonymous आपको राकेशजी ने समझा ही दिया है. शास्त्र कहते है एक ब्राह द्वितीय नास्ति. ब्राह तो एक ही है बस नाम अलग अलग है.

Amy said...

@ राकेश जी : आपकी दोनों टिप्पणियों के लिए धन्यवाद्. "शत्रु भाव रखने वाली" बात कहने का अर्थ इतना ही था की चाहे भाव या बिना भाव के कैसे भी कम से कम नाम तो जपा जा रहा है. @ कुंवर जी, अवधिया जी, महाशक्ति आप सभी का टिप्पणी करने के लिए आभार. @ Anonymous आपको राकेशजी ने समझा ही दिया है. शास्त्र कहते है एक ब्राह द्वितीय नास्ति. ब्राह तो एक ही है बस नाम अलग अलग है.