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शास्त्रों में जिस रक्ष संस्कृति का वर्णन है वो क्या है ?


जैसा की मैंने कल के अपने लेख में लिखा था हिन्दू धर्म ग्रन्थ में लिखे हर श्लोक के चार प्रकार के अर्थ (शब्दार्थ, भावार्थ, व्यंगार्थ और गूढार्थ) निकाले जा सकते है. संत कवी तुलसीदासजी ने ये पहले ही जान लिया था कि आगे कलयुग में आने वाले समय में आम मनुष्य, सदियों पहले संस्कृत जैसी कठिन भाषा में लिखे गए इन गूढ़ अर्थो, वाले ग्रंथो को समझने में असमर्थ होगा. इसीलिए उन्होंने रामचरितमानस की आम जन की भाषा में काव्य के रूप में रचना की.

आज हम देख रहे है कि लोग अपनी समझ और सामर्थ्य के अनुसार ग्रंथो का रस निचोड़ रहे है. किसी को इसमें से प्रेरणा लेकर उत्कृष्ट और सफल जीवन जीने मार्गदर्शन मिल रहा है वही किसी को इसमें केवल कीचड़ और गंदगी दिख रही है. कहने का तात्पर्य ये है की जैसी हमारी भावना होती है हम लोग उस चीज़ को वैसे ही देखते है. तुलसी बाबा ने रामचरितमानस में भी लिखा है :

राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे |
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥
देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा |
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी॥
रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा |
रबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई॥


भगवान श्री राम राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणों के बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी॥ महान रणधीर (राजा लोग) श्री रामचन्द्रजी के रूप को ऐसा देख रहे हैं, मानो स्वयं वीर रस शरीर धारण किए हुए हों। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए, मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो॥ छल से जो राक्षस वहाँ राजाओं के वेष में (बैठे) थे, उन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखा। नगर निवासियों ने दोनों भाइयों को मनुष्यों के भूषण रूप और नेत्रों को सुख देने वाला देखा॥

गूढार्थ शब्द दो शब्दों को जोड़ कर बना है जो है गूढ़ और अर्थ. गूढ़ कहते है पहेली को, या भेद को. तो गूढार्थ यांनी वो अर्थ जो शायद हमे उन शब्दों को पढ़कर तो शायद न मिले लेकिन फिर भी कुछ ख़ास अर्थ हो जो घटना में छिपा हो. अक्सर हम लोग पौराणिक ग्रंथो में से लिए गए किसी शब्द, नायक या घटना की एक छवि अपने दिमाग में अंकित कर लेते है. फिर हम उसके इर्द गिर्द अपने ख्यालो के हिसाब से अन्य घटनाओ को भी रूप देने की कोशिश करते है. आइये समझे की शास्त्र में राक्षस या रावण किस प्रकार के व्यक्ति को कहते है.

राक्षस : ऐसा कहते है कि पहले के ज़माने में राक्षस लोग होते थे जो मनुष्यों को मार कर खा जाते थे या जो आदमियों का खून पीते थे। क्या आपको नहीं लगता इस राक्षस सरीखे लोग आज भी हम सब के बीच में है. मार कर खा जाना या खून पीने से यहाँ तात्पर्य होता था की वो लोग जो दुसरे लोगो को परेशान किया करते थे या चैन से जीने नहीं देते थे वो लोग राक्षस सामान थे.

आज एक नेता पांच करोड़ रुपयों की बनी माला पहनती है, पार्टी के अधिवेशन में दो सौ करोड़ से पांच सौ करोड़ का खर्चा किया जाता है. क्या आपको नहीं लगता ये पैसा कितने कल्याणकारी कामो में सही इस्तेमाल किया जा सकता था. इस पैसे से कितनी सड़के बन सकती थी जिससे कितने लोगो को रोजगार मिल सकता था और कितने करोड़ लोगो को रोज आने जाने में समय और महंगे तेल की बचत कर सकते थे. इस पैसे से कितने गाँव में बिजली या पानी पहुचाया जा सकता था. चाहे सारा बुद्धिजीवी वर्ग इस कृत्य की निंदा कर रहा है लेकिन अभी खबर आई है की मुख्यमंत्री को पार्टी सांसदों, मंत्रियों और अधिकारियों की बैठक के दौरान मीडिया के सामने उन्हें नोटों की एक और माला पहनाई गई और पार्टी का कहना है कि अब दलित या दौलत की महारानी को सिर्फ़ नोटों की माला ही पहनाई जाएगी.

एक सर्वे के अनुसार देश में १९९२ से अब तक देश में ७३ (73) लाख करोड़ रूपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए है. ये धांधली का पैसा हमारे देश के ५३ (53) लाख करोड़ के सकल घरेलु उत्पाद से २७% (27%) ज्यादा है. इतने पैसे से देश में तीस लाख रूपये के लागत से २.४ (2.4) करोड़ प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोले जा सकते थे. यानि देश के हर गाँव में ३ चिकित्सा केंद्र. पांच लाख रूपये प्रत्येक की लागत से १४.६ (14.6) करोड़ निम्न / मध्य वर्गीय मकान बन सकते थे. ३.०२ (3.02) करोड़ रुपयों की लागत से २४.१ (24.1) केंद्रीय विद्यालय बन सकते थे जिसमे प्रत्येक में कक्षा छ से बारह तक के दो खंड या सेक्शन हो सकते थे. सम्पूर्ण भारत देश के परिधि को ९७ (97) बार चक्कर काटते हुए १४.६ (14.6) लाख किलोमीटर की सड़क बन सकती थी. चूँकि ये आज का विषय नहीं है इसलिए अगर आप इस भ्रष्टाचार के बारे में और विस्तृत जानकारी पढना चाहते है तो कृपया यहाँ क्लिक करे.

क्या आपको नहीं लगता कि ये आम जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई कहने वाले किसी भी राक्षस से कम है. इतने व्यपाक भ्रष्टाचार के चलते कितने लोग अकाल काल के गाल में समां गए होंगे. तो बस इसी तरह के भयानक राक्षस पुराने समय में भी होते थे. राक्षसों के बड़े बिखरे बाल, बहार निकले दांत आदि ये केवल चित्रकारों की कपोल कल्पना है. रक्ष संस्कृति को आज के राक्षस लोग बाकायदा जिन्दा रखे हुए है.

रावण : रावण घमंड का प्रतीक है. हमें उल्लेख मिलता है की रावण के दस सर और बीस हाथ थे. अक्सर चित्रकारों ने भी रावण को चित्रों में भी इसी तरह उकेरा है. जिस व्यक्ति की दसो इन्द्रियां ( कर्मेन्द्रिय + ज्ञानेन्द्रिय) सर उठा कर खड़ी हो और वो बीसियों तरीके से जुगाड़ लगाकर इन इन्द्रियों को तृप्त करने में लगा हो वो ही रावण है।
रावण का एक अर्थ और भी निकलता है। रावण उपरोक्त बतलाये राक्षस प्रवर्ती के लोगो के बीच रहता था और न केवल रहता था बल्कि उनका राजा भी था. राजा के चूँकि कई दुश्मन होते है इसलिए उसको खतरा ज्यादा होता है और इसलिए उसे ज्यादा सतर्क रहना पड़ता है. ज्योतिष शास्त्र में दस दिशाए बतलाई गई है जो है पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान (उत्तर-पूर्व), वायव्य (उत्तर-पश्चिम), नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम), आग्नेय (दक्षिण-पूर्व), आकाश (उर्ध्व), पाताल (अध). रावण के बारे में कहाँ जाता है कि वो इतना चतुर था कि उसे दसो दिशाओ में घट रही घटनाओं की सदैव जानकारी रहती थी इसलिए ऐसा लगता था की रावण के दस सर है। जो व्यक्ति इतना चतुर हो कि उसे दसो दिशाओ में घट रही घटनाओं की सदैव जानकारी रहे, और उन सूचनाओं को वो केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए इस्तेमाल करे, वो रावण ही है

अक्सर जो लोग अनैतिक या गलत कार्य करते है वो उसे जल्द से जल्द अंजाम देना चाहते है. रावण शायद हर कार्य को त्वरित गति से करने की क्षमता रखता होगा. माँ सीता के अपहरण में भी उसने तुरंत ही अपने कार्य को अंजाम दिया था. दसो दिशाओ की खबर रखने के कारण रावण दशानन कहलाया. उन खबरों पर तुरंत ही कोई फैसला लेने के कारण ये काह जाने लगा की रावण के दस सर और बीस हाथ है. उसके जैसी क्षमता किसी और में नहीं इसलिए कोई उसकी गद्दी की तरफ नज़र उठा कर न देखे.

अगली पोस्ट में भगवान राम और उनके चौदह वर्ष के वनवास का तात्पर्य समझे का प्रयास...
(चित्र : साभार गूगल )

1 comment:

Amitraghat said...

बहुत ही शानदार आर्टिकल...."
amitraghat.blogspot.com